हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा—वेश्यावृत्ति के लिए उकसाना मानवता का सबसे बुरा पतन।
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने मनाली सेक्स रैकेट मामले में दो महिलाओं की जमानत याचिका खारिज की। कोर्ट ने कहा—वेश्यावृत्ति के लिए उकसाना मानवता का सबसे बुरा पतन।
मनाली में कथित सेक्स रैकेट और मानव तस्करी से जुड़े एक गंभीर मामले में Himachal Pradesh High Court ने दो महिला आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “पैसे कमाने के लिए किसी को वेश्या बनने के लिए उकसाना मानवता का सबसे बुरा पतन है,” और ऐसे मामलों में नरमी बरतना समाज के लिए खतरनाक संदेश होगा।
कोर्ट का कड़ा रुख
न्यायमूर्ति Rakesh Kainthla ने सुनवाई के दौरान कहा कि आरोपों की प्रकृति अत्यंत गंभीर है और प्रथम दृष्टया यह मामला मानव तस्करी और शोषण का प्रतीत होता है। अदालत ने माना कि यदि आरोपियों को जमानत पर रिहा किया गया, तो इससे अन्य लोगों को भी इस तरह के अपराध करने का प्रोत्साहन मिल सकता है।
नौकरी का झांसा, फिर जबरन वेश्यावृत्ति
मामला मनाली पुलिस थाने में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। पुलिस को 22 दिसंबर 2025 को माल रोड और बस अड्डा क्षेत्र में चल रहे देह व्यापार की गुप्त सूचना मिली थी। इसके बाद पुलिस ने डिकॉय ग्राहकों और स्वतंत्र गवाहों की मदद से छापेमारी की और आरोपियों सहित कई लोगों को गिरफ्तार किया।
रेस्क्यू की गई लड़कियों ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि उन्हें पंजाब से घरेलू काम-काज की नौकरी दिलाने का झांसा देकर मनाली लाया गया था। लेकिन यहां पहुंचने के बाद उन्हें जबरन वेश्यावृत्ति में धकेल दिया गया। यह तथ्य अदालत के समक्ष भी रखा गया, जिसे न्यायालय ने गंभीरता से लिया।
बचाव पक्ष की दलील खारिज
आरोपी महिलाओं की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि उनकी मुवक्किलों को झूठा फंसाया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि कथित पीड़िताएं बालिग थीं और अपनी इच्छा से काम कर रही थीं। साथ ही यह तर्क दिया गया कि लड़कियों ने पहले किसी के खिलाफ शिकायत नहीं की थी, इसलिए उनके बयान पर संदेह किया जाना चाहिए।
हालांकि अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को प्रलोभन, धोखे या दबाव के आधार पर वेश्यावृत्ति में धकेला गया है, तो यह स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में आता है—चाहे पीड़िता बालिग ही क्यों न हो।
राज्य का पक्ष: रिहाई से बढ़ सकता है खतरा
राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता अर्शित शर्मा ने अदालत को बताया कि आरोपी संगठित रूप से अनैतिक व्यापार में लिप्त थे। उन्होंने आशंका जताई कि यदि उन्हें जमानत दी गई, तो वे इसी तरह के अपराध दोहरा सकते हैं।
अदालत ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि मुकदमे की सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है और इस चरण पर आरोपियों की रिहाई से गवाहों, विशेषकर पीड़िताओं, पर दबाव पड़ सकता है। इससे निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित होने की आशंका है।
कानून और समाज पर प्रभाव
यह मामला Immoral Traffic (Prevention) Act और मानव तस्करी से जुड़े प्रावधानों के तहत दर्ज किया गया है। अदालत का यह निर्णय संकेत देता है कि न्यायपालिका ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाने के पक्ष में है, खासकर जब आरोप शोषण और धोखाधड़ी से जुड़े हों।
निष्कर्ष
हाई कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि “सहमति” का तर्क उन मामलों में स्वीकार्य नहीं हो सकता, जहां सहमति धोखे, लालच या मजबूरी के आधार पर प्राप्त की गई हो। मनाली सेक्स रैकेट केस में जमानत खारिज कर अदालत ने न केवल कानून के सख्त अनुपालन का संदेश दिया है, बल्कि मानव तस्करी जैसे अपराधों के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति को भी रेखांकित किया है।
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