पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में स्वयं पेश होकर चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को चुनौती दी। आरोप लगाया कि यह कवायद बंगाल को निशाना बनाकर वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने के लिए की जा रही है। कोर्ट ने निर्दोष मतदाताओं की सुरक्षा का भरोसा दिया।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को एक दुर्लभ और अभूतपूर्व कदम उठाते हुए स्वयं सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित होकर चुनाव आयोग (ECI) के खिलाफ अपनी आपत्तियाँ रखीं। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग द्वारा की जा रही Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया का उद्देश्य त्रुटियों का सुधार नहीं, बल्कि वैध मतदाताओं के नाम हटाना है और इसका प्रयोग विशेष रूप से पश्चिम बंगाल को “टार्गेट” करने के लिए किया जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश CJI न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष ममता बनर्जी ने कहा,
“यह SIR इन्क्लूज़न के लिए नहीं, केवल डिलीशन के लिए है।”
वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान द्वारा प्रस्तुत याचिका में दावा किया गया कि अब तक 58 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जा चुके हैं, लगभग 88 लाख मतदाताओं को ‘logical discrepancy’ के तहत चिन्हित किया गया है, जबकि करीब 3 लाख आपत्तियाँ अभी भी लंबित हैं। यह सब ऐसे समय में किया जा रहा है जब अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन में मात्र 11 दिन शेष हैं।
भाषाई विविधता को बताया गया “गलत मिलान”
मुख्यमंत्री ने बंगाल की भाषाई और सामाजिक वास्तविकताओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि
Datta–Dutta, Roy–Ray, Ganguly–Ganguli जैसे सामान्य उपनामों के अंतर को “स्पेलिंग मिस्टेक” बताकर मतदाताओं को हटाया जा रहा है, जबकि ये स्थानीय उच्चारण और परंपरागत भिन्नताएँ हैं।
उन्होंने विवाह के बाद महिलाओं के उपनाम बदलने के उदाहरण का हवाला देते हुए पूछा,
“एक बेटी शादी के बाद ससुराल जाकर पति का उपनाम अपनाती है, क्या यह उसका नाम हटाने का आधार बन सकता है?”
समय और चयन पर सवाल
SIR की टाइमिंग पर सवाल उठाते हुए बनर्जी ने कहा कि यह प्रक्रिया त्योहारों और फसल कटाई के मौसम में कराई जा रही है, जब बड़ी संख्या में लोग अपने घरों से बाहर रहते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह कवायद केवल गैर-भाजपा शासित राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल, को निशाना बनाकर की जा रही है।
“अगर यह ज़रूरी है, तो केवल पश्चिम बंगाल ही क्यों? असम क्यों नहीं?” — उन्होंने पूछा।
सुप्रीम कोर्ट का आश्वासन
पीठ ने स्पष्ट किया कि
“हम यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी निर्दोष नागरिक मतदाता सूची से बाहर न हो।”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मामूली स्पेलिंग या भाषाई अंतर के आधार पर किसी मतदाता को हटाया नहीं जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि
“मृत या विधिक रूप से अयोग्य व्यक्तियों के नाम कानून के अनुसार हटाने होंगे।”
आधार कार्ड पर टिप्पणी से परहेज़
आधार कार्ड को स्वीकार न किए जाने के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि चूंकि आधार की नागरिकता के प्रमाण के रूप में वैधता का प्रश्न पहले से लंबित है और उस पर निर्णय सुरक्षित है, इसलिए इस स्तर पर टिप्पणी नहीं की जा सकती।
“आधार की अपनी सीमाएँ हैं,” — CJI ने कहा।
ECI का पक्ष
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि SIR के दौरान जारी नोटिसों में विसंगतियों के कारण पहले से दर्ज हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि सुनवाई के दौरान उठाई गई नई शिकायतें आयोग को अभी प्राप्त नहीं हुई हैं और उन्हें जांच के लिए समय चाहिए।
राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए द्विवेदी ने कहा कि
“राज्य सरकार के सहयोग की कमी के कारण आयोग को माइक्रो-ऑब्ज़र्वर्स नियुक्त करने पड़े।”
उनका दावा था कि राज्य ने अपेक्षित संख्या में BLOs और अधिकारी उपलब्ध नहीं कराए, जिससे जिला स्तर के अधिकारियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
अगली सुनवाई
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ECI को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा और मामले को सोमवार को पुनः सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया, ताकि आयोग नई शिकायतों की जांच कर सके।
यह मामला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, AITC सांसद डेरेक ओ’ब्रायन सहित अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिकाओं के समूह का हिस्सा है, जिनमें पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता को चुनौती दी गई है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने ECI को “logical discrepancy” सूची से संबंधित कई निर्देश जारी किए थे।
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