मद्रास हाईकोर्ट: कुंभाभिषेकम में भेदभाव नहीं, सभी समुदायों की भागीदारी अनिवार्य

मद्रास हाईकोर्ट ने मदुरै के मेलापननकाडी गांव में 8 फरवरी 2026 को होने वाले कुंभाभिषेकम उत्सव के लिए सभी समुदायों के प्रतिनिधियों वाली समिति गठित करने का निर्देश दिया। अदालत ने ‘फर्स्ट ऑनर’ पर रोक लगाते हुए समानता का सिद्धांत दोहराया।

मद्रास हाईकोर्ट ने धार्मिक आयोजनों में समानता और समावेशन पर जोर देते हुए मदुरै जिले के मेलापननकाडी गांव में स्थित मंदिरों में 8 फरवरी 2026 को प्रस्तावित कुंभाभिषेकम उत्सव के आयोजन के लिए सभी समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक समिति गठित करने का निर्देश दिया है।

न्यायमूर्ति एस. श्रीमथी ने यह आदेश एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया, जिसमें स्थानीय प्रशासन को निर्देश देने की मांग की गई थी कि कुंभाभिषेकम के आयोजन हेतु सभी समुदायों की सहभागिता सुनिश्चित की जाए।

‘व्यक्ति विशेष द्वारा आयोजन अस्वीकार्य’

अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि, “जब गांव में पांच समुदाय निवास करते हैं, तब कुंभाभिषेकम का आयोजन किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता।” न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि किसी व्यक्ति या समुदाय को ‘प्रथम सम्मान (First Honour)’ नहीं दिया जाएगा और आयोजन के दौरान किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा।

‘फिट पर्सन’ और समिति मिलकर करेंगे आयोजन

कोर्ट ने बताया कि पहले ही हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ न्यास (HR&CE) विभाग द्वारा 29 जनवरी को एक ‘फिट पर्सन’ नियुक्त किया जा चुका है। अब उसी फिट पर्सन को निर्देश दिया गया है कि वह गांव के पांचों समुदायों से एक-एक प्रतिनिधि को शामिल कर एक समिति का गठन करे।

यह समिति, फिट पर्सन के साथ मिलकर कुंभाभिषेकम उत्सव का आयोजन करेगी। इसके साथ ही, जिस व्यक्ति द्वारा अब तक आयोजन का दावा किया जा रहा था, उसे सभी संबंधित रिकॉर्ड समिति और फिट पर्सन को सौंपने का निर्देश भी दिया गया है।

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मंदिर और विवाद की पृष्ठभूमि

मेलापननकाडी गांव में स्थित अरुलमिघु अय्यनार मंदिर, अरुलमिघु मुनियंडी स्वामी मंदिर, अरुलमिघु करुपसामी मंदिर और अरुलमिघु मुथुमारियम्मन मंदिर में कुंभाभिषेकम प्रस्तावित है। गांव में पांच समुदायों की आबादी है, जिसके चलते आयोजन को लेकर प्रतिनिधित्व और अधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दोहराया कि धार्मिक आयोजनों में समानता, सामाजिक सद्भाव और सामूहिक सहभागिता संवैधानिक मूल्यों का अभिन्न हिस्सा है।


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