कर्नाटक हाईकोर्ट: RERA आदेश ‘डिक्री’ नहीं, सिविल कोर्ट में निष्पादन याचिका अमान्य

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि RERA अथॉरिटी या अपीलीय प्राधिकरण के आदेश ‘डिक्री’ नहीं हैं और इन्हें सिविल अदालतों में निष्पादन याचिका के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि RERA Act एक अलग प्रवर्तन तंत्र प्रदान करता है और राशि भूमि राजस्व बकाए की तरह वसूली जानी चाहिए। इस महत्वपूर्ण फैसले ने RERA आदेशों के प्रवर्तन को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता प्रदान की है।

कर्नाटक हाईकोर्ट: RERA आदेश ‘डिक्री’ नहीं, सिविल कोर्ट में निष्पादन याचिका अमान्य

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) अथवा इसकी अपीलीय प्राधिकरण के आदेशों को सीधे सिविल अदालतों में दायर निष्पादन याचिकाओं के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता। अदालत के अनुसार, RERA के आदेश Code of Civil Procedure (CPC) की धारा 2(2) में परिभाषित “डिक्री” की श्रेणी में नहीं आते, इसलिए सिविल कोर्ट के माध्यम से उनका निष्पादन कानूनी रूप से संभव नहीं है।

यह फैसला न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने Mantri Developer Pvt. Ltd. द्वारा दायर तीन संबंधित रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाओं में डेवलपर ने उन आदेशों को चुनौती दी थी जिनके अंतर्गत सिविल अदालतों ने RERA आदेशों के निष्पादन की प्रक्रिया को वैध माना था।

विवाद की पृष्ठभूमि

2023 में RERA ने विभिन्न गृह-खरीदारों के पक्ष में आदेश पारित किए थे। इन आदेशों को लागू कराने के लिए खरीदारों ने सिविल अदालतों में निष्पादन याचिकाएँ दायर कीं। डेवलपर ने CPC की धारा 47 के तहत आवेदन दायर कर यह तर्क दिया कि सिविल अदालतों के पास RERA आदेशों के निष्पादन का अधिकार नहीं है, क्योंकि RERA अधिनियम स्वयं अपना पूर्ण निष्पादन तंत्र प्रदान करता है।

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जब निचली अदालत ने इन आवेदनों को खारिज कर दिया, तो डेवलपर हाईकोर्ट पहुँचा।

डेवलपर और गृह-खरीदारों के तर्क

डेवलपर का तर्क:

  • RERA Act एक self-contained code है।
  • धारा 79 सिविल अदालतों को RERA मामलों में किसी भी प्रकार की कार्यवाही से रोकती है।
  • कर्नाटक RERA नियमों के नियम 26 में स्पष्ट रूप से आदेशों के प्रवर्तन की प्रक्रिया बताई गई है।
  • अतः सिविल अदालत से निष्पादन कराना न केवल अवैध बल्कि अधिनियम की मंशा के विरुद्ध है।

गृह-खरीदारों का तर्क:

  • RERA आदेश “डिक्री” के समान हैं, इसलिए सिविल अदालतें निष्पादन कर सकती हैं।

अदालत की विस्तृत व्याख्या

हाईकोर्ट ने RERA अधिनियम और CPC के प्रावधानों का गहन परीक्षण किया।

  • धारा 40(1) कहती है कि ब्याज, दंड या मुआवजा भूमि राजस्व के बकाए के रूप में वसूला जाएगा।
  • धारा 79 सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करती है।
  • नियम 26 के अनुसार, RERA आदेशों को पहले RERA अथॉरिटी स्वयं डिक्री की तरह लागू करेगी। केवल तब, जब प्रवर्तन सम्भव न हो, आदेश जिला सिविल अदालत को भेजे जा सकते हैं।

अदालत ने कहा कि “डिक्री” की CPC धारा 2(2) में तीन आवश्यक शर्तें हैं—

  1. कार्यवाही सूट अर्थात plaint से प्रारंभ हो,
  2. कोर्ट द्वारा औपचारिक व अंतिम निर्णय हो,
  3. यह निर्णय ‘डिक्री’ कहलाए।

चूंकि RERA में शिकायतें plaint के रूप में नहीं दायर होतीं, इसलिए RERA आदेशों को “डिक्री” नहीं कहा जा सकता।

प्रासंगिक न्यायिक मिसालें

अदालत ने कई उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख किया—

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अदालत का निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने कहा कि RERA आदेशों का प्रवर्तन तहसीलदार के माध्यम से land revenue recovery प्रक्रिया द्वारा होना चाहिए। सीधे सिविल अदालत में निष्पादन याचिका देना कानूनी रूप से अवैध है। केवल तब, जब राजस्व प्राधिकारी स्तर पर सभी प्रयास विफल हो जाएँ, अत्यंत अपवादात्मक परिस्थितियों में ही सिविल कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है।

अदालत ने निचली अदालतों के आदेशों को रद्द करते हुए डेवलपर द्वारा दायर धारा 47 CPC के आवेदन स्वीकार किए और कहा कि संबंधित पक्ष विधि द्वारा उपलब्ध उपायों का उपयोग कर सकते हैं।


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