DCW में चेयरपर्सन रिक्ति पर हाईकोर्ट सख्त, दिल्ली सरकार से मांगा जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली महिला आयोग (DCW) में जनवरी 2024 से रिक्त चेयरपर्सन और सदस्यों के पदों पर चिंता जताई। RJD सांसद सुधाकर सिंह की PIL पर सरकार से 25 फरवरी तक जवाब तलब।


Delhi High Court ने बुधवार को दिल्ली महिला आयोग (DCW) में चेयरपर्सन और अन्य पदों की लंबी रिक्ति पर कड़ा रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश Devendra Kumar Upadhyay की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने दिल्ली सरकार के वकील से निर्देश लेकर बताने को कहा कि आयोग में रिक्त पदों को भरने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

यह जनहित याचिका (PIL) Sudhakar Singh, सांसद (RJD), द्वारा दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि जनवरी 2024 से आयोग में चेयरपर्सन और सदस्य नियुक्त नहीं हैं, जिससे संस्था का कामकाज ठप हो गया है।

कोर्ट की नाराजगी: “क्या आयोग बंद है?”

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए पूछा, “क्या आयोग बंद है?” दिल्ली सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता Sameer Vashist ने कहा कि आयोग बंद नहीं है और निर्देश लेने के लिए समय मांगा।

अदालत ने स्पष्ट किया कि आयोग को सौंपे गए वैधानिक दायित्वों को देखते हुए इसे किसी भी कारण से रिक्त नहीं छोड़ा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि आयोग बंद नहीं है तो यह बताया जाए कि रिक्त पदों को भरने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। मामले को 25 फरवरी को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

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याचिकाकर्ता का दावा: “संस्था केवल कागजों पर”

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता Satyam Singh Rajput ने दलील दी कि जनवरी 2024 से आयोग में न तो चेयरपर्सन हैं और न ही सदस्य। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग भौतिक रूप से भी बंद है और कार्यदिवसों में कार्यालय में न तो अधिकारी मौजूद हैं, न ही कोई हेल्पडेस्क या शिकायत निवारण व्यवस्था।

याचिका में कहा गया है कि नेतृत्व और प्रशासनिक जवाबदेही के अभाव में परिवार परामर्श इकाइयों, रेप क्राइसिस सेल, संकट हस्तक्षेप सेवाओं और शिकायत निवारण तंत्र जैसे वैधानिक तंत्र ठप हो गए हैं।

संवैधानिक उल्लंघन का आरोप

PIL में दावा किया गया है कि यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3) और 21 का उल्लंघन है, क्योंकि इससे महिलाओं को न्याय, सुरक्षा और संस्थागत समर्थन से वंचित किया जा रहा है। याचिका में कहा गया कि दिल्ली देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की उच्च दर वाले राज्यों में शामिल है, ऐसे समय में आयोग का निष्क्रिय रहना गंभीर चिंता का विषय है।

याचिकाकर्ता ने समयबद्ध निर्देश जारी करने, चेयरपर्सन की नियुक्ति सुनिश्चित करने और आयोग के कामकाज की न्यायिक निगरानी की मांग की है, ताकि भविष्य में संस्थागत ठहराव (institutional paralysis) न हो।

सरकार को पहले भी दी गई थी जानकारी

याचिका में उल्लेख है कि 26 दिसंबर 2025 को दिल्ली के मुख्य सचिव और उपराज्यपाल को विस्तृत अभ्यावेदन सौंपे गए थे, जिनमें आयोग के गैर-कार्यात्मक होने की स्थिति और उसके संवैधानिक प्रभावों पर प्रकाश डाला गया था।

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हालांकि, याचिकाकर्ता के अनुसार, अब तक कोई प्रभावी सुधारात्मक कदम नहीं उठाया गया।

अगली सुनवाई अहम

हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि महिलाओं के संरक्षण के लिए गठित वैधानिक संस्था को निष्क्रिय नहीं रहने दिया जा सकता। अब 25 फरवरी को होने वाली सुनवाई में दिल्ली सरकार को स्पष्ट करना होगा कि आयोग के पुनर्गठन और नियुक्तियों के लिए क्या समयसीमा तय की गई है।

यह मामला राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़ा अहम मुद्दा बनता जा रहा है।


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