‘घूसखोर पंडत’ विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म का शीर्षक बदलने का दिया आदेश, कहा– अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा– अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने मनोज बाजपेयी और नीरज पांडे की फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ का शीर्षक बदलने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और किसी समुदाय की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाई जा सकती।

मनोज बाजपेयी और निर्देशक नीरज पांडे की आगामी हिंदी फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ कानूनी विवादों में घिर गई है। फिल्म के शीर्षक को लेकर दायर जनहित याचिका (Public Interest Litigation) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को निर्माताओं को फिल्म का नाम बदलने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि शीर्षक एक विशेष समुदाय के प्रति अपमानजनक प्रतीत होता है और इसे वर्तमान नाम से रिलीज़ नहीं किया जा सकता।

यह फिल्म, जिसे नेटफ्लिक्स का समर्थन प्राप्त है, अब किसी अन्य शीर्षक के साथ रिलीज़ होगी।


अनुच्छेद 19(1)(a) बनाम 19(2): कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुनवाई के बाद अधिवक्ता विनोद कुमार तिवारी ने बताया कि पीठ ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमाओं पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।

उन्होंने कहा:

“अनुच्छेद 19(1) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत उस पर युक्तिसंगत प्रतिबंध भी हैं। संविधान की प्रस्तावना स्पष्ट है कि किसी भी समाज के वर्ग को ‘घूसखोर पंडत’ जैसे शब्दों से बदनाम नहीं किया जा सकता।”

तिवारी के अनुसार, न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि केवल शीर्षक ही नहीं, बल्कि फिल्म की कथा और प्रस्तुति में भी आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए।


जस्टिस नागरत्ना की कड़ी मौखिक टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा:

“आप किसी को भी क्यों नीचा दिखाना चाहते हैं? यह नैतिकता और लोक-व्यवस्था के खिलाफ है। जागरूक होना एक बात है, लेकिन ऐसे समय में जब देश में पहले से अशांति है, इस तरह की स्थिति उत्पन्न करना उचित नहीं है। हमें लगा था कि फिल्म निर्माता और पत्रकार जिम्मेदार लोग होते हैं और वे अनुच्छेद Article 19(1)(a) के अपवादों और युक्तिसंगत प्रतिबंधों से परिचित हैं।”

उन्होंने संविधान में निहित ‘बंधुत्व’ (Fraternity) के सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि संविधान निर्माताओं को भारत की जातीय, धार्मिक और सामाजिक विविधता का पूर्ण ज्ञान था, इसलिए उन्होंने बंधुत्व को मूलभूत संवैधानिक मूल्य के रूप में शामिल किया।

“किसी भी समाज के वर्ग को अपमानित नहीं किया जाना चाहिए। यदि आप अपनी स्वतंत्रता का उपयोग किसी समुदाय को नीचा दिखाने के लिए करते हैं, तो हम इसकी अनुमति नहीं दे सकते।”


याचिका में क्या कहा गया था?

यह जनहित याचिका महेंद्र चतुर्वेदी द्वारा दायर की गई थी, जो स्वयं को भारतीय शास्त्रों एवं आध्यात्मिक परंपराओं के अध्येता एवं आचार्य बताते हैं। अधिवक्ता विनीत जिंदल के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया कि:

  • ‘पंडित’ शब्द ऐतिहासिक रूप से विद्वता, नैतिक आचरण और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का प्रतीक है।
  • इसे भ्रष्टाचार (‘घूसखोर’) से जोड़ना ब्राह्मण समुदाय की गरिमा और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाता है।
  • यह जाति और धर्म आधारित रूढ़िवादिता (stereotyping) को बढ़ावा देता है।
ALSO READ -  तलाक की याचिका दायर करने के लिए एक वर्ष की अनिवार्य अवधि को माफ कर उच्च न्यायलय ने दिया डिक्री-

याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि:

  • अनुच्छेद Article 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है।
  • अनुच्छेद Article 19(2) के तहत मानहानि, सार्वजनिक व्यवस्था और साम्प्रदायिक सौहार्द की रक्षा हेतु प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
  • फिल्म का शीर्षक और प्रचार सामग्री अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) तथा 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है।
  • OTT प्लेटफॉर्म्स के लिए प्रभावी नियामक तंत्र की कमी भी चिंता का विषय है।

संवैधानिक संतुलन का प्रश्न

यह मामला एक बार फिर रेखांकित करता है कि भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक समरसता के बीच संतुलन बनाए रखना कितना जटिल प्रश्न है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश रचनात्मक स्वतंत्रता की सीमाओं और सामुदायिक गरिमा की संवैधानिक सुरक्षा के बीच संतुलन की बहस को और तीखा कर सकता है।


#SupremeCourt #FreedomOfSpeech #Article19 #FilmControversy #ManojBajpayee #NeerajPandey #OTTRegulation #ConstitutionOfIndia #BrahminCommunity #LegalNews #अभिव्यक्ति_की_स्वतंत्रता #सुप्रीमकोर्ट #संविधान #फिल्म_विवाद #कानूनी_समाचार

Leave a Comment