कोई भी व्यक्ति जो सार्वजनिक मंच पर बोलता है, उसके विचारों पर लोगों को आपत्ति जताने का अधिकार है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने कथावाचक अनिरुद्धाचार्य के व्यक्तित्व अधिकार मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति आलोचना से ऊपर नहीं होते, हालांकि कोर्ट ने उनके व्यक्तित्व अधिकारों की अंतरिम सुरक्षा दी।
अनिरुद्धाचार्य मामले में दिल्ली हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
Delhi High Court ने कथावाचक Aniruddhacharya से जुड़े व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति को स्वयं को आलोचना से ऊपर नहीं समझना चाहिए।
यह मामला उनके कथित विवादित बयानों के वायरल वीडियो क्लिप, सोशल मीडिया पोस्ट और कथित डीपफेक कंटेंट को लेकर दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने अपनी छवि और व्यक्तित्व अधिकारों की सुरक्षा की मांग की थी।
कोर्ट ने क्षेत्राधिकार पर उठाए सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस Tushar Rao Gedela ने सबसे पहले इस बात पर सवाल उठाया कि जब याचिकाकर्ता वृंदावन में रहते हैं तो मामला दिल्ली हाई कोर्ट में क्यों दायर किया गया।
न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इंटरनेट पर सामग्री हर जगह उपलब्ध है, इसलिए यह कहना कि केवल दिल्ली में ही देखा जा रहा है, पर्याप्त कारण नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी कहा कि देश के अन्य हाई कोर्ट और जिला अदालतें भी ऐसे मामलों में आदेश पारित कर सकती हैं।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब पूरे देश की अदालतें उपलब्ध हैं, तो दिल्ली हाई कोर्ट पर ही असाधारण अधिकार क्षेत्र क्यों डाला जा रहा है।
“सार्वजनिक जीवन में हैं तो आलोचना झेलनी होगी”
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति को आलोचना और प्रशंसा दोनों के लिए तैयार रहना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि
कोई भी व्यक्ति जो सार्वजनिक मंच पर बोलता है, उसके विचारों पर लोगों को आपत्ति जताने का अधिकार है।
न्यायाधीश ने यह भी कहा कि धार्मिक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को आलोचना से ऊपर नहीं समझना चाहिए।
अदालत की दार्शनिक टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस गेडेला ने याचिकाकर्ता को सलाह देते हुए कहा कि आध्यात्मिक व्यक्ति को आलोचना, प्रशंसा और पहचान से ऊपर होना चाहिए।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा से बहुत अधिक जुड़ा हुआ है, तो यह उसके अपने सिद्धांतों के विपरीत हो सकता है।
न्यायाधीश ने उदाहरण देते हुए कहा कि आदि शंकराचार्य ने कभी मानहानि के मुकदमे दायर नहीं किए, बल्कि वे विचारों से बहस करते थे और लोगों को समझाते थे।
वायरल वीडियो और डीपफेक का मुद्दा
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि उनके कई वीडियो सोशल मीडिया और अन्य वेबसाइटों पर वायरल किए जा रहे हैं, जिससे उनकी छवि को नुकसान हो रहा है।
यह भी कहा गया कि कुछ वीडियो और टिप्पणियां एआई और डीपफेक तकनीक के जरिए बनाई गई हैं, जिनमें उन्हें ऐसी बातें कहते हुए दिखाया जा रहा है जो उन्होंने कभी कही ही नहीं।
इस पर अदालत ने माना कि यदि किसी व्यक्ति के नाम और पहचान का दुरुपयोग किया जा रहा है या डीपफेक कंटेंट बनाया जा रहा है, तो यह गंभीर मुद्दा है और इसके खिलाफ कानूनी संरक्षण दिया जा सकता है।
कोर्ट ने दिए व्यक्तित्व अधिकारों की अंतरिम सुरक्षा
मामले में दलीलें सुनने के बाद Delhi High Court ने अनिरुद्धाचार्य के व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा के लिए अंतरिम संरक्षण प्रदान करने का आदेश दिया।
अदालत ने संकेत दिया कि यदि किसी व्यक्ति की पहचान, नाम, आवाज या छवि का दुरुपयोग कर फर्जी या डीपफेक कंटेंट बनाया जाता है, तो यह व्यक्तित्व अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है।
मामले का महत्व
यह मामला व्यक्तित्व अधिकार, सोशल मीडिया कंटेंट, डीपफेक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों से जुड़ा है।
एक ओर अदालत ने यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति आलोचना से ऊपर नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान का दुरुपयोग कर फर्जी कंटेंट बनाना स्वीकार्य नहीं है।
निष्कर्ष
अनिरुद्धाचार्य मामले में दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तित्व अधिकारों के बीच संतुलन को दर्शाती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि आलोचना लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा है, लेकिन डीपफेक और पहचान के दुरुपयोग को कानून संरक्षण नहीं दे सकता। साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत देते हुए उनके व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा का आदेश भी दिया।
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