NEET-PG 2025 कट-ऑफ घटाने का फैसला बरकरार, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

दिल्ली हाईकोर्ट ने NEET-PG 2025 की पात्रता कट-ऑफ प्रतिशत घटाने के निर्णय को वैध ठहराया। कोर्ट ने कहा—नीतिगत फैसलों में न्यायिक हस्तक्षेप तभी संभव जब मनमानी या विकृति सिद्ध हो।


दिल्ली हाईकोर्ट ने NEET-PG 2025 की पात्रता कट-ऑफ प्रतिशत में कमी के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय विचार-विमर्श के बाद लिया गया नीतिगत कदम है और इसमें किसी प्रकार की मनमानी या दुर्भावना नहीं पाई गई।

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि कार्यपालिका के प्रशासनिक या नीतिगत निर्णयों की न्यायिक समीक्षा सीमित दायरे में ही की जा सकती है। अदालत ने अपने आदेश में दोहराया, “यह स्थापित विधि है कि प्रशासनिक कार्रवाई और कार्यपालिका के नीति निर्णय की न्यायिक समीक्षा केवल मनमानी और विकृति के आधार पर ही संभव है।”

NBEMS की अधिसूचना को दी गई थी चुनौती

मामला उस अधिसूचना से जुड़ा था, जिसे नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन मेडिकल साइंसेस (NBEMS) ने 13 जनवरी को जारी किया था। इस अधिसूचना में NEET-PG 2025 के लिए न्यूनतम अर्हक प्रतिशत में संशोधन किया गया था।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने के बाद कट-ऑफ कम करना मेरिट प्रणाली को कमजोर करता है और इससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही यह भी दलील दी गई कि यह कदम संविधान के अनुच्छेद 21 और 47 के तहत राज्य के दायित्वों के विपरीत है।

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याचिका में यह भी कहा गया कि लगभग 9,000 रिक्त सीटों को भरने के उद्देश्य से कट-ऑफ में ढील दी गई, जो शैक्षणिक मानकों से समझौता करने जैसा है।

कोर्ट: मेरिट से समझौता नहीं

हाईकोर्ट ने इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पात्रता मानदंड में कमी से अंतिम चयन प्रक्रिया प्रभावित नहीं होगी, क्योंकि प्रवेश अब भी मेरिट के आधार पर ही दिया जाएगा।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पात्रता का दायरा बढ़ाने का अर्थ केवल इतना है कि अधिक अभ्यर्थियों को काउंसलिंग में भाग लेने का अवसर मिलेगा। इससे राउंड-3 काउंसलिंग और, यदि आयोजित हो, तो स्ट्रे वैकेंसी राउंड में सीटों के भरने की संभावना बढ़ेगी।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “पात्रता मानदंड में कमी करने से केवल अधिक अभ्यर्थियों को काउंसलिंग में भाग लेने का अवसर मिलेगा। इससे रिक्त सीटों का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित होगा और संभावित रिक्तियां रोकी जा सकेंगी।”

सार्वजनिक हित को प्राथमिकता

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि चयनित उम्मीदवारों को अंततः पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स पूरा करना होगा और डिग्री या डिप्लोमा प्राप्त करने के लिए सभी निर्धारित शैक्षणिक मानकों को पूरा करना अनिवार्य रहेगा।

अदालत ने कहा, “सार्वजनिक हित में यह आवश्यक है कि सभी रिक्त पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल सीटें भरी जाएं ताकि अधिक डॉक्टर विशेषज्ञता हासिल कर सकें और अपने-अपने क्षेत्र में कुशल बन सकें।”

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिसूचना में किसी प्रकार की विकृति या मनमानी नहीं पाई गई है। इसलिए वर्तमान में चल रही NEET-PG 2025 की राउंड-3 काउंसलिंग प्रक्रिया में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

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न्यायिक समीक्षा की सीमाएं फिर स्पष्ट

इस फैसले के साथ दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बार फिर यह सिद्धांत दोहराया कि नीतिगत मामलों में अदालतें तब तक हस्तक्षेप नहीं करेंगी जब तक निर्णय स्पष्ट रूप से मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या विधि-विरुद्ध न हो।

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने संकेत दिया कि शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों में न्यायिक संयम आवश्यक है, खासकर जब वे व्यापक सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर लिए गए हों।


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