नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ – सबरीमाला प्रवेश विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई

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सबरीमाला प्रवेश विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट 7 अप्रैल 2026 से सबरीमाला मंदिर प्रवेश मामले पर नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ में सुनवाई शुरू करेगा। धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ जैसे संवैधानिक प्रश्नों पर होगा निर्णायक विचार।

Supreme Court of India सात अप्रैल से बहुचर्चित सबरीमाला मंदिर प्रवेश विवाद पर सुनवाई फिर शुरू करने जा रहा है। यह मामला केवल केरल के एक मंदिर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब धार्मिक स्वतंत्रता, समानता के अधिकार और ‘संवैधानिक नैतिकता’ जैसे व्यापक संवैधानिक प्रश्नों का परीक्षण बनेगा।

सुनवाई नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष होगी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट समय-सारिणी तय करते हुए निर्देश दिया है कि 7 से 9 अप्रैल तक पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं और उनके समर्थन में उपस्थित पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी। इसके बाद 14 से 16 अप्रैल तक मूल रिट याचिकाकर्ताओं को सुना जाएगा। 22 अप्रैल को यदि आवश्यक हुआ तो प्रत्युत्तर (रिजॉइंडर) पर बहस होगी। अदालत ने समय-सीमा के कड़ाई से पालन पर जोर दिया है।

पीठ ने कहा कि नोडल वकील आपसी परामर्श से इस तरह की आंतरिक व्यवस्था सुनिश्चित करें ताकि दोनों पक्षों की मौखिक दलीलें निर्धारित समय में पूरी हो सकें। इससे संकेत मिलता है कि अदालत इस लंबे समय से लंबित संवैधानिक विवाद को व्यवस्थित और समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना चाहती है।

2018 का ऐतिहासिक फैसला और उसके बाद

विवाद की पृष्ठभूमि 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले में है, जब संविधान पीठ ने Sabarimala Sree Dharma Sastha Temple में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। इससे पहले 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर परंपरागत प्रतिबंध लागू था। अदालत ने उस परंपरा को असंवैधानिक करार देते हुए कहा था कि यह समानता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है।

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हालांकि इस फैसले के खिलाफ व्यापक स्तर पर पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। इनमें यह तर्क दिया गया कि मंदिर की परंपरा एक ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण प्राप्त है।

10 फरवरी 2020 को नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने व्यापक संवैधानिक प्रश्नों को बड़े मंच पर विचार के लिए संदर्भित करने के निर्णय को बरकरार रखा। इन प्रश्नों में यह भी शामिल है कि अदालतें किसी धार्मिक प्रथा को ‘आवश्यक’ मानने के लिए किस मानदंड का उपयोग करेंगी, और धार्मिक स्वतंत्रता व लैंगिक समानता के बीच संतुलन कैसे स्थापित होगा।

केंद्र सरकार की भूमिका

इस बार की सुनवाई में Union of India भी पुनर्विचार याचिकाओं के समर्थन में खड़ा है। इसका अर्थ है कि केंद्र सरकार 2018 के निर्णय को चुनौती देने वाले पक्ष के साथ है, जबकि मूल याचिकाकर्ता उस फैसले को बरकरार रखने की मांग कर रहे हैं।

केरल सरकार का बयान

सुनवाई से पहले केरल के विधि मंत्री P Rajeev ने स्पष्ट किया कि फिलहाल मामला नई संविधान पीठ के गठन तक सीमित है। उन्होंने कहा कि पहले पुनर्विचार याचिकाओं पर विचार के लिए संविधान पीठ गठित करने का निर्देश था और अब उसी दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। उनके अनुसार, अंतिम निर्णय के बाद ही आगे की कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।

व्यापक संवैधानिक महत्व

यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है। इससे जुड़े प्रश्न अन्य धार्मिक स्थलों और परंपराओं पर भी असर डाल सकते हैं। अदालत को यह तय करना होगा कि ‘संवैधानिक नैतिकता’ की अवधारणा धार्मिक परंपराओं पर किस हद तक लागू होती है और क्या लैंगिक समानता धार्मिक स्वायत्तता पर वरीयता रखेगी।

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सात अप्रैल से शुरू होने वाली सुनवाई भारतीय संवैधानिक कानून के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ सकती है। देश की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि सर्वोच्च अदालत धार्मिक आस्था और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित करती है।


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