🏛️ CJI Surya Kant का आत्ममंथन: “न्यायाधीशों की अपूर्णता स्वीकार करना ही सच्चे न्यायिक नेतृत्व की पहचान”
Meta Description: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक नेतृत्व तब कमजोर होता है जब न्यायाधीश स्वयं को ‘परिपूर्ण’ मानने लगते हैं। राष्ट्रमंडल न्यायिक शिक्षकों Commonwealth Judicial Teachers (CJE) की 11वीं बैठक में उन्होंने न्यायिक शिक्षा और विनम्रता को संस्थागत मूल्य बनाने की वकालत की।
भारत के मुख्य न्यायाधीश CJI J Surya Kant ने न्यायिक नेतृत्व को लेकर एक महत्वपूर्ण आत्मविश्लेषी टिप्पणी की। उन्होंने कहा:
“न्यायिक नेतृत्व इसलिए प्रभावित नहीं होता क्योंकि न्यायाधीश अपूर्ण होते हैं, बल्कि तब प्रभावित होता है जब वे यह दिखावा करते हैं कि वे अपूर्ण नहीं हैं।”
सीजेआई शुक्रवार को राष्ट्रमंडल न्यायिक शिक्षकों Commonwealth Judicial Teachers (CJE) की 11वीं द्विवार्षिक बैठक के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
⚖️ ‘परिपूर्णता’ का मिथक और नेतृत्व पर असर
सीजेआई ने कहा कि जब हम यह मान लेते हैं कि न्यायाधीश त्रुटिहीन हैं, तो इससे न्यायिक नेतृत्व को नुकसान पहुंचता है। उनके अनुसार—
- न्यायाधीश भी उन संस्थानों की तरह हैं जिनका वे नेतृत्व करते हैं।
- वे भी विकास, सुधार और उन्नति करने में सक्षम रहते हैं।
- त्रुटि की संभावना को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि नेतृत्व की मजबूती है।
उन्होंने न्यायिक नेतृत्व की पारंपरिक धारणा में आमूलचूल परिवर्तन का आह्वान किया।
🌍 राष्ट्रमंडल स्तर पर सर्वोच्च निकाय का प्रस्ताव
सीजेआई ने सदस्य देशों में:
- न्यायिक शिक्षा
- बार
- और न्यायपालिका
को एकीकृत करने के लिए एक राष्ट्रमंडल सर्वोच्च निकाय के गठन की वकालत की।
उनका मानना है कि न्यायिक नेतृत्व को प्रभावी बनाने के लिए संस्थागत स्तर पर समन्वय और प्रशिक्षण आवश्यक है।
📚 “विनम्रता एक पेशेवर सुरक्षा कवच है”
सीजेआई ने ऐतिहासिक उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा:
“इतिहास में सबसे सम्मानित न्यायिक नेताओं ने कभी भी त्रुटिहीनता का प्रदर्शन नहीं किया। सर्वश्रेष्ठ नेता वे थे जो अपनी सीमाओं से परिचित रहे, त्रुटि की संभावना के प्रति सतर्क रहे और सीखने के लिए खुले रहे।”
उन्होंने जोर देकर कहा:
- विनम्रता केवल व्यक्तिगत गुण नहीं है।
- यह एक पेशेवर सुरक्षा कवच है।
- इसे हर न्यायिक अधिकारी को बिना किसी अपवाद के सिखाया जाना चाहिए।
🎓 CJE की भूमिका: परिवर्तन के मौन सूत्रधार
सीजेआई के अनुसार, न्यायिक नेतृत्व को शिक्षित करने के लिए एक अधिक ईमानदार आधार स्वीकार करना होगा—कि न्यायाधीश भी सीखने और बदलने में सक्षम हैं।
उन्होंने कहा:
“CJE परिवर्तनकारी यात्राओं के पीछे मौन सूत्रधार हैं।”
उनके अनुसार, न्यायिक शिक्षा केवल विधिक ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें नेतृत्व, आत्मविश्लेषण और संस्थागत उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
📌 व्यापक संदेश
सीजेआई का यह संबोधन न्यायपालिका के भीतर आत्ममंथन, विनम्रता और निरंतर सीखने की संस्कृति को बढ़ावा देने का संकेत देता है।
यह संदेश उस दौर में महत्वपूर्ण है, जब न्यायपालिका की पारदर्शिता, जवाबदेही और नेतृत्व शैली पर व्यापक सार्वजनिक विमर्श जारी है।
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