7/11 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस: बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला- सबूत नाकाफी, सभी आरोपी रिहा

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Bombay High Court Verdict: 7/11 Train Blast Accused Acquitted After 17 Years


2006 के बहुचर्चित 7/11 लोकल ट्रेन बम विस्फोट मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया

न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति श्याम चांडक की विशेष पीठ ने कहा कि “अभियोजन पक्ष अपना मामला उचित संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह असफल रहा।”

यह मामला महाराष्ट्र राज्य बनाम कमाल अहमद मोहम्मद वकील अंसारी और अन्य के रूप में दर्ज था।


🔍 हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां:

  • अदालत ने अभियोजन द्वारा प्रस्तुत गवाहों के बयानों को अविश्वसनीय बताया।
  • 100 दिन बाद टैक्सी ड्राइवरों या यात्रियों द्वारा पहचान को “प्राकृतिक नहीं” माना गया।
  • बरामद हथियार, नक्शे और बम जैसे सबूतों को “अप्रासंगिक” कहा गया क्योंकि अभियोजन बम के प्रकार की पहचान नहीं कर सका।
  • अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि पूरा मामला अनुमानों और कमजोर साक्ष्य पर आधारित था।

⚖️ पृष्ठभूमि: 189 मृतक, 824 घायल

11 जुलाई 2006 को मुंबई की पश्चिमी रेलवे लाइन पर सात लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार धमाकों में 189 लोग मारे गए और 824 घायल हुए थे। घटना के बाद महाराष्ट्र पुलिस की एंटी टेरेरिज्म स्क्वॉड (ATS) ने जांच शुरू की थी।


🏛️ निचली अदालत का फैसला (2015):

  • 5 को मृत्युदंड:
    • कमाल अंसारी
    • मोहम्मद फैसल अताउर रहमान शेख
    • एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी
    • नवीद हुसैन खान
    • आसिफ खान
  • 7 को आजीवन कारावास:
    • तनवीर अहमद अंसारी
    • मोहम्मद मजीद शफी
    • शेख मोहम्मद अली आलम
    • मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी
    • मुजम्मिल अताउर रहमान शेख
    • सुहैल महमूद शेख
    • ज़मीर अहमद लतीफुर रहमान शेख
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👉 इनमें से कमाल अंसारी की 2021 में नागपुर जेल में COVID-19 से मृत्यु हो गई


🧑‍⚖️ अपील और सुनवाई:

  • राज्य सरकार ने मृत्युदंड की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था।
  • वहीं दोषियों ने अपनी सज़ा और दोषसिद्धि के खिलाफ अपील दायर की थी।
  • यह मामला 2015 से लंबित था।
  • 2022 में राज्य ने अदालत को बताया कि साक्ष्य भारी मात्रा में हैं, और सुनवाई में 5–6 महीने लग सकते हैं
  • अदालत ने अंततः जुलाई 2024 से दैनिक सुनवाई के लिए विशेष पीठ गठित की।

🧑‍⚖️ वकीलों की दलीलें:

  • आरोपियों की ओर से:
    वरिष्ठ अधिवक्तागण डॉ. एस. मुरलीधर, युग मोहित चौधरी, नित्या रामकृष्णन और एस. नागमुथु ने तर्क दिया कि “अभियोजन पक्ष का पूरा मामला त्रुटिपूर्ण था, और दोषसिद्धि मात्र अनुमानों पर आधारित थी।”
  • राज्य की ओर से:
    विशेष सरकारी वकील राजा ठाकरे ने कहा कि यह मामला “दुर्लभतम से दुर्लभ (rarest of rare)” की श्रेणी में आता है, और मृत्युदंड बरकरार रहना चाहिए।

📌 निष्कर्ष: सिस्टम पर सवाल

यह फैसला भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह छोड़ता है—
👉 क्या 17 साल जेल में काट चुके निर्दोषों को कोई मुआवज़ा या पुनर्वास मिलेगा?
👉 क्या जांच एजेंसियों को उनकी विफलताओं के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा?
👉 क्या आतंकी मामलों में मीडिया ट्रायल के प्रभाव को कानूनी रूप से सीमित किया जाएगा?

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