सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मृत व्यक्तियों के पक्ष में पारित डिक्री ‘शून्य’, ट्रायल कोर्ट की डिक्री लागू होगी

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🏛️ सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मृत व्यक्तियों के पक्ष में पारित डिक्री ‘शून्य’, ट्रायल कोर्ट की डिक्री लागू होगी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मृत व्यक्तियों के पक्ष में पारित डिक्री शून्य मानी जाएगी। अदालत ने ट्रायल कोर्ट की डिक्री को वैध ठहराते हुए एक्सीक्यूशन बहाल की। यह फैसला संपत्ति विवादों में कानूनी प्रक्रिया की स्पष्टता को दर्शाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी मृत व्यक्ति के पक्ष में अपीलीय अदालत द्वारा डिक्री पारित की जाती है, तो वह “कानूनी रूप से शून्य (Nullity)” मानी जाएगी। ऐसे में मूल (ट्रायल कोर्ट) की डिक्री को ही लागू किया जा सकता है। अदालत ने यह फैसला विक्रम भालचंद्र घोंगडे बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य (Neutral Citation: 2025 INSC 1283) में सुनाया।

न्यायमूर्ति पमिदिघंटम श्री नारसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की खंडपीठ ने कहा,

“जब अपील के दौरान अपीलकर्ता का निधन हो जाता है और उसकी मृत्यु के बाद निर्णय सुनाया जाता है, तो वह निर्णय कानूनी रूप से अस्तित्वहीन होता है। ऐसी स्थिति में ट्रायल कोर्ट की डिक्री ही वैध और प्रवर्तनीय (Executable) मानी जाएगी।”


⚖️ मामले की पृष्ठभूमि

मामला महाराष्ट्र के वर्धा जिले के तकर्खेड़ा गांव की कृषि भूमि से जुड़ा था। यह भूमि मूल रूप से एक पूर्व सैनिक को आवंटित की गई थी। उनकी मृत्यु के बाद, कलेक्टर ने यह भूमि तीसरे, चौथे और पांचवें प्रतिवादियों को पुनः आवंटित कर दी।
मृत सैनिक के उत्तराधिकारियों ने इस आदेश को चुनौती देते हुए स्वामित्व घोषणा और कब्जे की बहाली के लिए दीवानी वाद दायर किया।

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ट्रायल कोर्ट ने वाद स्वीकार करते हुए भूमि का स्वामित्व याचिकाकर्ता के पूर्वजों को मान्य किया और प्रतिवादियों को अवैध कब्जेदार ठहराया।

चौथे और पांचवें प्रतिवादी ने दीवानी अपील दायर की, लेकिन सुनवाई से पहले ही दोनों की मृत्यु हो गई। इसके बावजूद पहली अपीलीय अदालत ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर डिक्री में संशोधन किया।

मूल वादियों ने इसके खिलाफ दूसरी अपील दाखिल की, जो बाद में वापस ले ली गई। उसके बाद उत्तराधिकारी (अपीलकर्ता) ने ट्रायल कोर्ट की डिक्री को लागू करने के लिए Execution Petition दाखिल की, जिसे निचली अदालत ने यह कहकर खारिज कर दिया कि ट्रायल कोर्ट की डिक्री “अपील की डिक्री में समाहित (Merged)” हो चुकी है।


⚖️ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को पलटते हुए कहा कि

“पहली अपीलीय अदालत ने जिस समय निर्णय दिया, उस वक्त दोनों अपीलकर्ता मृत थे। इसलिए यह निर्णय मृत व्यक्तियों के पक्ष में पारित डिक्री है, जो विधिक दृष्टि से शून्य (Nullity) है।”

अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की डिक्री ही लागू करने योग्य है और एक्सीक्यूशन कोर्ट ने इसे अस्वीकार कर गलती की।

खंडपीठ ने Bibi Rahmani Khatoon बनाम Harkoo Gope तथा Kiran Singh बनाम Chaman Paswan जैसे पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि—

“यदि कोई डिक्री शून्य है, तो उसकी अमान्यता को कभी भी और किसी भी स्तर पर उठाया जा सकता है, यहां तक कि निष्पादन (Execution) की प्रक्रिया के दौरान भी।”


🧾 कानूनी दृष्टिकोण से अहम बातें

  • मृत अपीलकर्ताओं के पक्ष में पारित डिक्री अवैध और अप्रवर्तनीय होती है।
  • ऐसी डिक्री के आधार पर न तो कब्जा दिया जा सकता है और न ही संपत्ति का अधिकार तय किया जा सकता है।
  • यदि अपील सुनवाई से पहले अपीलकर्ता की मृत्यु हो जाती है और उनके कानूनी वारिसों को पक्षकार नहीं बनाया जाता, तो पूरी कार्यवाही स्वतः निरस्त (Abated) मानी जाएगी।
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📜 अदालत का निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

“जब तक अपीलीय डिक्री वैध रूप से पारित नहीं होती, ट्रायल कोर्ट की डिक्री प्रभावी रहती है। चूंकि अपीलीय डिक्री मृत व्यक्तियों के पक्ष में पारित हुई थी, वह शून्य है और ट्रायल कोर्ट की डिक्री को ही लागू किया जाएगा।”

इसके साथ ही, अदालत ने निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया और एक्सीक्यूशन प्रोसीडिंग्स बहाल कर दीं।


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