📰 केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: एक ही संपत्ति से जुड़े कई दस्तावेज़ों पर चुनौती में कोर्ट फीस केवल मुख्य राहत पर देनी होगी
🧾 केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब एक ही संपत्ति से संबंधित कई दस्तावेजों को चुनौती दी जाती है, तो कोर्ट फीस केवल मुख्य राहत (Principal Relief) पर देय होगी, न कि सहायक राहतों (Ancillary Reliefs) पर। अदालत ने यह निर्णय धारा 6(1) की व्याख्या करते हुए दिया।
⚖️ केरल हाईकोर्ट का अहम फैसला: एक ही संपत्ति से जुड़े दस्तावेजों पर कोर्ट फीस केवल मुख्य राहत पर आधारित होगी
केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी संपत्ति से संबंधित एक से अधिक दस्तावेजों को एक साथ चुनौती दी जाती है, तो कोर्ट फीस केवल मुख्य राहत (Principal Relief) के आधार पर ली जाएगी, न कि प्रत्येक सहायक राहत (Ancillary Relief) पर अलग-अलग।
न्यायमूर्ति पी. कृष्ण कुमार की एकल पीठ ने यह फैसला मदथिल पकरुति बनाम टी.पी. कुंजनंदन एवं अन्य मामले में सुनाया, जिसमें निचली अदालत द्वारा अतिरिक्त कोर्ट फीस जमा करने के आदेश को चुनौती दी गई थी।
🏛️ मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने मूल रूप से एक स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) के लिए सिविल मुकदमा दायर किया था।
बाद में प्रतिवादी की लिखित दलीलों को देखते हुए, उसने याचिका में संशोधन कर दो दस्तावेजों —
- डॉक्यूमेंट नं. 805/2008
- डॉक्यूमेंट नं. 1938/2010 (SRO, Naduvannur)
को अवैध और शून्य घोषित करने की मांग भी जोड़ी।
प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने मुकदमे का मूल्यांकन कम करके किया है, क्योंकि उसने केवल पहले दस्तावेज़ (805/2008, ₹1,50,000) के मूल्य के आधार पर कोर्ट फीस दी, जबकि बाद का दस्तावेज़ (1938/2010) ₹6,07,300 का था।
कोयिलांडी की मुन्सिफ कोर्ट ने याचिकाकर्ता को आदेश दिया कि वह याचिका का मूल्य संशोधित करे और अतिरिक्त कोर्ट फीस जमा करे।
⚖️ हाईकोर्ट की सुनवाई और विधिक विश्लेषण
हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जब दोनों दस्तावेज़ एक ही संपत्ति से संबंधित हैं और दोनों को एक साथ चुनौती दी गई है, तो बाद वाले दस्तावेज़ के मूल्य के आधार पर कोर्ट फीस नहीं लगाई जा सकती।
प्रतिवादी इस सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए।
न्यायमूर्ति कृष्ण कुमार ने केरल कोर्ट फीस एंड सूट वैल्यूएशन एक्ट, 1959 की धारा 6(1) के प्रावधान का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है —
“यदि कोई राहत केवल मुख्य राहत की सहायक हो, तो वादी को केवल मुख्य राहत के मूल्य पर कोर्ट फीस देनी होगी।”
📜 कोर्ट ने कहा — ‘मुख्य और सहायक राहतों में स्पष्ट भेद जरूरी’
कोर्ट ने State Bank of India v. Niyas (2021 (2) KLT 172) मामले का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य और सहायक राहत में फर्क करने का असली परीक्षण यह है कि —
“क्या कोई राहत अपने आप में स्वतंत्र रूप से टिक सकती है या वह दूसरी पर निर्भर है?”
इस आधार पर न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता का मामला यह था कि पहला दस्तावेज़ (805/2008) केवल एक औपचारिक समझौता था, जो किसी वास्तविक लेनदेन पर आधारित नहीं था और यह मध्यस्थता समझौते की शर्तें पूरी करने के लिए बनाया गया था।
दूसरा दस्तावेज़ (1938/2010) पूरी तरह पहले पर निर्भर था।
कोर्ट ने कहा —
“जब पहला दस्तावेज़ शून्य घोषित हो जाएगा, तो बाद वाला स्वतः अमान्य हो जाएगा। इसलिए बाद वाले दस्तावेज़ को चुनौती केवल सहायक (Ancillary) राहत है।”
⚖️ कोर्ट फीस केवल मुख्य दस्तावेज़ पर लागू होगी
इस आधार पर हाईकोर्ट ने कहा —
“धारा 6(1) के प्रावधानों के अनुसार, याचिकाकर्ता को दूसरे दस्तावेज़ के मूल्य पर कोर्ट फीस देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। मुख्य विवाद पहले दस्तावेज़ की वैधता से जुड़ा है।”
इसलिए, कोर्ट ने मुन्सिफ कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया।
🕰️ देरी पर नाराज़गी, मुकदमे के शीघ्र निपटान के निर्देश
न्यायमूर्ति कृष्ण कुमार ने यह भी कहा कि मामला अत्यधिक विलंब से गुजर रहा है, इसलिए निचली अदालत को निर्देश दिया गया कि वह इसे शीघ्रतम संभव समय में निपटाए।
👨⚖️ वकीलों की उपस्थिति
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री फिरोज के.एम., श्री एस. कन्नन, और श्रीमती एम. शाजना
- प्रतिवादी की ओर से: श्री राजीश के.वी. और श्री एल.एस. भगवल दास
📘 निष्कर्ष
केरल हाईकोर्ट का यह निर्णय संपत्ति विवादों और दस्तावेज़ रद्द करने के मामलों में एक महत्वपूर्ण नज़ीर (Judicial Precedent) साबित होगा।
अदालत ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि —
“जहां एक दस्तावेज़ दूसरे पर निर्भर हो, वहां कोर्ट फीस केवल मुख्य दस्तावेज़ पर आधारित होगी।”
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