मृतक के वारिसों से स्टाम्प ड्यूटी वसूली संभव, पर संपत्ति की सीमा तक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि मृतक के कानूनी वारिसों से स्टाम्प ड्यूटी और पेनल्टी की वसूली की जा सकती है, लेकिन केवल उतनी संपत्ति की सीमा तक जो उन्हें विरासत में मिली हो। कोर्ट ने कलेक्टर को जांच का आदेश दिया।


मृतक के वारिसों की जिम्मेदारी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिसों से स्टाम्प ड्यूटी और जुर्माने की वसूली की जा सकती है, लेकिन यह वसूली केवल मृतक की उस संपत्ति की सीमा तक ही होगी जो वारिसों को विरासत में प्राप्त हुई हो।

यह फैसला आगरा निवासी राजकुमार वर्मा की याचिका पर न्यायमूर्ति Kshitij Shailendra ने दिया। अदालत ने कहा कि वारिसों को पूरी तरह जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन उनकी व्यक्तिगत संपत्ति से वसूली नहीं की जा सकती जब तक यह साबित न हो कि उन्हें मृतक की संपत्ति विरासत में मिली है।


क्या था पूरा मामला

मामले के अनुसार आगरा निवासी राकेश कुमार वर्मा ने वर्ष 2020 में कृषि भूमि खरीदी थी। बाद में स्टाम्प विभाग ने जांच में स्टाम्प ड्यूटी की कमी पाई और लगभग 16.55 लाख रुपये की स्टाम्प ड्यूटी कमी और जुर्माना लगाया।

इस आदेश के खिलाफ उन्होंने अपील दायर की, लेकिन अपील लंबित रहने के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके बेटे राज कुमार वर्मा और दीपक सोनी को मामले में कानूनी वारिस के रूप में पक्षकार बनाया गया।

वर्ष 2025 में अपील खारिज हो गई, जिसके बाद प्रशासन ने फिर से वसूली की कार्रवाई शुरू कर दी।

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वारिसों की दलील और सरकार का पक्ष

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने अपने पिता से कोई संपत्ति या धन विरासत में प्राप्त नहीं किया है, इसलिए उनसे स्टाम्प ड्यूटी की वसूली नहीं की जा सकती। उनका तर्क था कि यदि वसूली करनी है तो प्रशासन मृतक की संपत्ति से करे, लेकिन वारिसों से व्यक्तिगत रूप से वसूली नहीं की जा सकती।

वहीं सरकारी वकील का कहना था कि स्टाम्प ड्यूटी का आदेश अंतिम हो चुका है और कानून के अनुसार वारिसों को पूरी तरह छूट नहीं दी जा सकती। इसलिए वसूली की कार्रवाई जारी रह सकती है।


कोर्ट ने क्या कहा

अदालत ने स्टाम्प एक्ट और यूपी राजस्व संहिता, 2006 के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि वारिसों को “डिफॉल्टर” माना जा सकता है, लेकिन उनकी जिम्मेदारी केवल उतनी ही होगी जितनी संपत्ति उन्हें मृतक से प्राप्त हुई हो।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह एक तथ्यात्मक प्रश्न है कि वारिसों को मृतक से कितनी संपत्ति मिली है। इस तथ्य की जांच कलेक्टर द्वारा की जाएगी।


कोर्ट के निर्देश

अदालत ने मामले में विस्तृत निर्देश जारी करते हुए कहा:

  • याचिकाकर्ता एक माह के भीतर कलेक्टर के समक्ष आपत्ति दाखिल करें
  • अपने और अपने पिता के आयकर रिटर्न प्रस्तुत करें
  • कलेक्टर चार माह के भीतर जांच कर निर्णय ले
  • जांच पूरी होने तक कोई गिरफ्तारी या जबरन वसूली नहीं होगी
  • याचिकाकर्ता अपनी संपत्ति बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकेंगे
  • बैंक खाते में विवादित राशि के बराबर बैलेंस रखना होगा

फैसले का कानूनी महत्व

यह फैसला स्टाम्प ड्यूटी, राजस्व वसूली और उत्तराधिकार कानून से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि वारिसों को मृतक के दायित्वों से पूरी तरह मुक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन उनकी जिम्मेदारी सीमित होगी और केवल विरासत में मिली संपत्ति तक ही रहेगी।

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यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है, जहां सरकारी बकाया की वसूली मृतक के वारिसों से की जाती है।


निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला वारिसों की देनदारी के सिद्धांत को स्पष्ट करता है। कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि सरकार बकाया वसूल सकती है, लेकिन वारिसों की व्यक्तिगत संपत्ति से नहीं, बल्कि केवल मृतक से प्राप्त संपत्ति की सीमा तक ही वसूली की जा सकती है।


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