Article 227 के दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त: DRT रजिस्ट्रार की नोटिस खारिज, वकीलों को ‘माउथपीस नहीं’ बनने की चेतावनी

  • “Bar और Bench एक ही रथ के दो पहिए हैं — यदि एक पहिया दूसरे पर ब्रेक लगाएगा, तो रथ आगे नहीं बढ़ेगा।”
  • अधिवक्ता अपने मुवक्किल का मात्र माउथपीस नहीं होता
  • “अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि न्यायालय का एक जिम्मेदार अधिकारी भी होता है।”

SARFAESI Act के तहत DRT रजिस्ट्रार द्वारा जारी नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि Article 227 के तहत याचिका बनाए रखने के लिए ‘grave injustice’ आवश्यक है और वकील को निरर्थक याचिकाएं दायर करने से मना करना चाहिए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने Article 227 के तहत दायर एक याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक न्याय की विफलता (failure of justice) या गंभीर अन्याय (grave injustice) न हो, तब तक इस संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का उपयोग नहीं किया जा सकता।

Article 227 के दुरुपयोग पर इलाहाबाद HC सख्त: DRT रजिस्ट्रार की नोटिस खारिज, वकीलों को ‘माउथपीस नहीं’ बनने की चेतावनी

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि अधिवक्ता अपने मुवक्किल का मात्र माउथपीस नहीं होता, और यदि मुवक्किल किसी निरर्थक (frivolous) याचिका या दलील पर ज़ोर देता है, तो वकील का कर्तव्य है कि वह उसे ऐसा न करने की सलाह दे और ऐसे ब्रीफ को स्वीकार करने से इंकार करे।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ता ने SARFAESI Act, 2002 की धारा 17 के तहत दायर सिक्योरिटाइजेशन एप्लिकेशन में Debt Recovery Tribunal (DRT), लखनऊ के रजिस्ट्रार द्वारा जारी नोटिस की वैधता को चुनौती दी थी।

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रजिस्ट्रार ने याचिकाकर्ता को 17-11-2025 को व्यक्तिगत रूप से या अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित होकर यह बताने को कहा था कि सिक्योरिटाइजेशन एप्लिकेशन को क्यों न स्वीकार किया जाए। नोटिस में यह भी कहा गया था कि अनुपस्थिति की स्थिति में मामला एकतरफा (ex parte) सुना जा सकता है।

याचिकाकर्ता की आपत्ति

याचिकाकर्ता का तर्क था कि:

  • सिक्योरिटाइजेशन एप्लिकेशन की स्वीकृति, सुनवाई और निस्तारण का अधिकार केवल DRT के प्रेसाइडिंग ऑफिसर को है
  • रजिस्ट्रार को कारण बताओ नोटिस जारी करने का अधिकार नहीं है
  • यह कार्य DRT (Procedure) Rules, 1993 के प्रतिकूल है

कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ

कोर्ट ने Rules 4, 5, 12, 13, 22 और 23 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि:

  • सिक्योरिटाइजेशन एप्लिकेशन DRT के रजिस्ट्रार के समक्ष ही प्रस्तुत की जाती है
  • जब नियमों के तहत रजिस्ट्रार को नोटिस जारी करने का अधिकार दिया गया है, तो इसे अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं कहा जा सकता
  • बिना नोटिस जारी किए आवेदन की सुनवाई संभव ही नहीं है

कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की वास्तविक शिकायत केवल इतनी थी कि मामला प्रेसाइडिंग ऑफिसर के समक्ष सूचीबद्ध होने में कुछ देरी हुई, जिससे उसे कोई कानूनी नुकसान नहीं हुआ।

Article 227 पर स्पष्ट संदेश

कोर्ट ने दो टूक कहा कि:

“यह नोटिस न तो न्याय की विफलता का कारण बना और न ही किसी गंभीर अन्याय का, जो कि Article 227 के तहत याचिका बनाए रखने की अनिवार्य शर्त है।”

इस आधार पर याचिका को प्रवेश स्तर (admission stage) पर ही खारिज कर दिया गया।

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हाईकोर्ट का समय बर्बाद करने पर नाराज़गी

कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि:

  • फ्रेश मामलों की सूची में 207 केस
  • अतिरिक्त सूची में 128 केस
  • डेली IA लिस्ट में 51 केस लंबित थे

इसके बावजूद बार-बार समझाने पर भी याचिकाकर्ता के वकील ने DRT के समक्ष जाने के बजाय हाईकोर्ट में ज़ोर दिया, जिससे अदालत का बहुमूल्य समय व्यर्थ हुआ।

युवा वकील को चेतावनी, लेकिन राहत

कोर्ट ने कहा कि सामान्यतः ऐसे मामलों में लागत (cost) लगाई जाती, लेकिन चूंकि संबंधित वकील:

  • युवा है
  • 2024 में ही बार काउंसिल में नामांकित हुआ है

इसलिए अदालत ने नरम रुख अपनाया।

हालांकि, कड़ी चेतावनी देते हुए कोर्ट ने कहा:

“अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि न्यायालय का एक जिम्मेदार अधिकारी भी होता है।”

और प्रसिद्ध पंक्ति दोहराई:

“Bar और Bench एक ही रथ के दो पहिए हैं — यदि एक पहिया दूसरे पर ब्रेक लगाएगा, तो रथ आगे नहीं बढ़ेगा।”


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