वैवाहिक विवाद में दर्ज झूठे केस से आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता : इलाहाबाद हाई कोर्ट

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद में दर्ज ‘झूठे’ मामलों के आधार पर पत्नी व उसके परिजनों को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता; धारा 306 IPC में आपराधिक मंशा जरूरी।


वैवाहिक विवाद और आत्महत्या: कोर्ट की अहम टिप्पणी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल वैवाहिक विवाद के चलते दर्ज किए गए मामलों—भले ही वे झूठे क्यों न हों—के आधार पर पत्नी या उसके परिजनों को आत्महत्या के लिए उकसाने (abetment of suicide) का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

समीर जैन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि धारा 306 IPC के तहत अपराध साबित करने के लिए स्पष्ट आपराधिक मंशा (mens rea) और प्रत्यक्ष उकसावे का होना आवश्यक है।


मामले की पृष्ठभूमि

मामला एक पति की आत्महत्या से जुड़ा था, जिसके पिता ने अगस्त 2022 में एफआईआर दर्ज कर पत्नी और उसके परिजनों पर उत्पीड़न और झूठे मुकदमे दर्ज करने का आरोप लगाया था।

आरोप था कि पैतृक संपत्ति के विवाद को लेकर दबाव बनाया गया और लगातार मामलों के चलते मृतक तनाव में आ गया। अंततः उसने जुलाई 2022 में खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली।

जांच के दौरान एक कथित सुसाइड नोट भी मिला, जिसमें मृतक ने मानसिक पीड़ा और मुकदमों का जिक्र किया। इसके आधार पर पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया और निचली अदालत ने संज्ञान लेकर समन जारी किए।


हाई कोर्ट में चुनौती और दलीलें

पत्नी और उसके परिवार ने इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

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याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि यदि पति पत्नी द्वारा दायर मामलों के कारण आत्महत्या करता है, तब भी यह स्वतः धारा 306 IPC के तहत अपराध नहीं बनता। इसके लिए यह साबित करना आवश्यक है कि मृतक के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

वहीं, राज्य और शिकायतकर्ता पक्ष ने तर्क दिया कि लगातार उत्पीड़न और मुकदमों के कारण मृतक इस स्थिति में पहुंच गया कि उसके पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं था।


कोर्ट का विश्लेषण: ‘इरादा’ और ‘उकसावा’ जरूरी

हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि धारा 306 IPC के तहत अपराध तभी बनता है जब आत्महत्या आरोपी के प्रत्यक्ष उकसावे या आपराधिक मंशा का परिणाम हो।

अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि पत्नी या उसके परिजनों ने मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया।


सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

अदालत ने Amalendu Pal v. State of West Bengal फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मानसिक पीड़ा या तनाव अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसावे का प्रमाण नहीं है।

साथ ही Kamaruddin Dastagir Sanadi v. State of Karnataka मामले का उल्लेख करते हुए कहा गया कि घरेलू विवाद समाज में सामान्य हैं और आत्महत्या का निर्णय व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है।


‘कोई अन्य विकल्प नहीं’—यह साबित करना जरूरी

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह दिखाना आवश्यक है कि मृतक के पास आत्महत्या के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।

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यहां, भले ही मृतक मुकदमों से परेशान था, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि वह पूरी तरह से मजबूर था और उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं था।


निष्कर्ष: आरोपपत्र और कार्यवाही रद्द

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने पाया कि आरोपपत्र कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है।

अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए पत्नी और उसके परिजनों के खिलाफ दाखिल आरोपपत्र और लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।


न्यायिक संदेश: वैवाहिक विवाद ≠ आपराधिक उकसावा

यह फैसला स्पष्ट करता है कि वैवाहिक विवादों और कानूनी कार्यवाहियों को स्वतः आपराधिक उकसावे के रूप में नहीं देखा जा सकता।

कोर्ट ने दोहराया कि आपराधिक कानून के दायरे में लाने के लिए ठोस इरादा, प्रत्यक्ष उकसावा और परिस्थितियों का स्पष्ट संबंध आवश्यक है।


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