कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि चेक बाउंस मामलों में ट्रायल कोर्ट चेक राशि से अधिकतम दोगुना ही जुर्माना लगा सकती है। न्यायमूर्ति वी. श्रीशनंदा ने एक दशक पुराने वाणिज्यिक विवाद में अतिरिक्त राज्य जुर्माना रद्द किया।
चेक बाउंस मामलों में दंड निर्धारण को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टता दी है। न्यायमूर्ति वी. श्रीशनंदा ने कहा कि ट्रायल कोर्ट चेक की अनादृत (dishonoured) राशि से अधिकतम दो गुना से ज्यादा जुर्माना नहीं लगा सकती। अदालत ने इस आधार पर एक दशक पुराने वाणिज्यिक विवाद में आंशिक राहत प्रदान की।
यह मामला बागलकोट की कृषक महिला महादेवी से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 2007 में ₹5,000 की छूट के बाद ₹3.8 लाख में दो ट्रेलर खरीदे थे। भुगतान के लिए दिया गया चेक बाउंस हो गया, जिसके बाद विक्रेता ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) के तहत शिकायत दर्ज कराई।
निचली अदालत का आदेश
बनहट्टी मजिस्ट्रेट कोर्ट ने वर्ष 2017 में महादेवी को दोषी ठहराते हुए
- ₹7.6 लाख विक्रेता को भुगतान करने
- तथा ₹5,000 राज्य को “defraying expenses” के रूप में देने का आदेश दिया।
महादेवी की जिला अदालत में अपील खारिज होने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुँचा, जहाँ उन्होंने यह तर्क रखा कि ट्रेलर उन्हें कभी सौंपे ही नहीं गए।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति श्रीशनंदा ने माना कि महादेवी गैर-डिलीवरी के अपने दावे को प्रमाणित करने में विफल रहीं। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा राज्य को ₹5,000 का अतिरिक्त भुगतान लगाने में त्रुटि हुई है, क्योंकि
“इस लेन-देन में किसी भी प्रकार की सरकारी मशीनरी शामिल नहीं थी।”
अदालत ने दो टूक कहा:
“ट्रायल कोर्ट चेक की अनादृत राशि से दोगुना से अधिक जुर्माना नहीं लगा सकती।”
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने
- ₹7.6 लाख की क्षतिपूर्ति (compensation) को बरकरार रखा
- लेकिन राज्य को देय ₹5,000 की राशि को रद्द कर दिया।
इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि चेक बाउंस मामलों में दंड का दायरा कानून द्वारा तय सीमा से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता, और अनावश्यक राज्य-संबंधित जुर्माने नहीं लगाए जा सकते।
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