नोएडा सेक्टर 126 थाने में महिला वकील को 14 घंटे अवैध हिरासत में रखकर यौन शोषण के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया। कोर्ट ने सीलबंद लिफाफे में सीसीटीवी फुटेज पेश करने का आदेश दिया।
महिला वकील के यौन शोषण के आरोप से सुप्रीम कोर्ट स्तब्ध, नोएडा पुलिस से सीसीटीवी फुटेज तलब
महिला वकील के आरोपों से सुप्रीम कोर्ट हैरान
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के नोएडा से सामने आए एक गंभीर और चौंकाने वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस हिरासत में कथित यौन शोषण के आरोपों पर सख्त रुख अपनाया है। नोएडा के सेक्टर 126 पुलिस थाना पर एक महिला वकील ने आरोप लगाया है कि उसे 14 घंटे तक अवैध हिरासत में रखकर शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गईं तथा यौन शोषण किया गया। न्याय की आस में महिला वकील ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां उसकी आपबीती सुनकर न्यायाधीश भी हैरान रह गए।
सुप्रीम कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज तलब की
शुक्रवार को हुई सुनवाई में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने नोएडा पुलिस को निर्देश दिया कि घटना वाले दिन की पूरी सीसीटीवी फुटेज सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित कर कोर्ट में पेश की जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फुटेज किसी भी स्थिति में डिलीट या छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए।
महिला वकील ने कोर्ट को क्या बताया?
महिला वकील ने अपनी याचिका में बताया कि वह 3 दिसंबर को अपने एक मुवक्किल की सहायता के लिए सेक्टर 126 पुलिस थाने गई थी। उसका कहना है कि जब उसने अपने मुवक्किल से संबंधित शिकायत पर एफआईआर दर्ज कराने की मांग की, तो पुलिसकर्मियों ने जानबूझकर उसे परेशान करना शुरू कर दिया।
महिला वकील के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने उसे थाने में ही रोक लिया और लगभग 14 घंटे तक अवैध हिरासत में रखा। इस दौरान उसके साथ न सिर्फ मानसिक और शारीरिक यातनाएं दी गईं, बल्कि यौन शोषण भी किया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस कृत्य में थाने के एसएचओ और अन्य पुरुष पुलिसकर्मी शामिल थे।
डराने-धमकाने और दबाव का आरोप
महिला वकील का यह भी कहना है कि पुलिसकर्मियों ने घटना के दौरान और उसके बाद उसे डराने-धमकाने की कोशिश की, ताकि वह इस मामले को आगे न बढ़ाए। उसने आरोप लगाया कि एक महिला होने के साथ-साथ एक वकील होने के बावजूद उसके साथ कानून के रक्षक ही कानून को कुचलते नजर आए।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला केवल एक व्यक्ति के आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों की कार्यशीलता और पारदर्शिता से भी जुड़ा हुआ है। पीठ ने टिप्पणी की—
“हम पहले से ही पुलिस स्टेशनों में चालू और प्रभावी सीसीटीवी कैमरों को सुनिश्चित करने जैसे मुद्दों से निपट रहे हैं। सामान्यतः सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता, लेकिन इस मामले में आरोप बेहद गंभीर हैं और यह सीसीटीवी कैमरों को ब्लॉक करने के मुद्दे से भी संबंधित है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सच्चाई सामने लाने के लिए सीसीटीवी फुटेज देखना आवश्यक है।
पुलिस कमिश्नर को सीधी जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गौतमबुद्धनगर के पुलिस कमिश्नर को व्यक्तिगत रूप से यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि संबंधित दिन की सभी सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी जाए। कोर्ट ने चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि फुटेज के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अगली सुनवाई 7 जनवरी को
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी के लिए तय की है। उसी दिन नोएडा पुलिस को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत करनी होगी। इस सुनवाई पर अब सभी की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि यह मामला पुलिस जवाबदेही, हिरासत में महिलाओं की सुरक्षा और कानून के शासन से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है।
व्यापक महत्व वाला मामला
यह मामला केवल एक महिला वकील की व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुलिस थानों में मानवाधिकारों, महिलाओं की सुरक्षा और पुलिस सुधारों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती इस बात का संकेत है कि यदि आरोप सही पाए गए, तो यह मामला देशभर में पुलिस व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
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