अरावली खनन विवाद: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजस्थान से दिल्ली तक विरोध तेज, ‘अरावली बचाओ’ आंदोलन शुरू

सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2025 के फैसले के बाद अरावली पहाड़ियों को लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में विरोध तेज हो गया है। नई परिभाषा से 90% अरावली के संरक्षण से बाहर होने की आशंका, अवैध खनन पर चिंता और माउंट आबू से ‘अरावली बचाओ’ आंदोलन की शुरुआत।

अरावली खनन विवाद: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजस्थान से दिल्ली तक विरोध तेज, ‘अरावली बचाओ’ आंदोलन शुरू

अरावली पर संकट: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देशव्यापी विरोध

राजस्थान में अरावली पहाड़ियों को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है और अब इसकी आंच राजस्थान से निकलकर हरियाणा और दिल्ली तक पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2025 के फैसले, जिसमें पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिशों के आधार पर अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को स्वीकार किया गया, के बाद पर्यावरण प्रेमियों, स्थानीय निवासियों और राजनीतिक दलों में गहरा आक्रोश देखने को मिल रहा है।

स्थानीय स्तर पर टकराव, अवैध खनन के आरोप

उदयपुर, सिरोही और आसपास के जिलों में भूमि उपयोग और खनन गतिविधियों को लेकर स्थानीय लोगों और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई क्षेत्रों में अवैध खनन और निर्माण कार्य जारी हैं, जिससे अरावली की प्राकृतिक संरचना और पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि अरावली के जंगल और पहाड़ी क्षेत्र जल स्रोतों की सुरक्षा, भूजल पुनर्भरण और मिट्टी के संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनका दावा है कि यदि खनन पर प्रभावी रोक नहीं लगी, तो क्षेत्र में जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन और गहराएगा।

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प्रशासन का रुख: कानून के तहत कार्रवाई का दावा

राज्य प्रशासन ने आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कानून के अनुसार कार्रवाई की जा रही है और अवैध खनन को रोकने के लिए लगातार निरीक्षण किए जा रहे हैं। सिरोही जिले में प्रशासन और पुलिस ने हाल ही में अवैध खनन स्थलों पर कार्रवाई भी की है। हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि जमीनी स्तर पर प्रयास अभी भी अपर्याप्त हैं।

सोशल मीडिया से सड़क तक आंदोलन

अरावली को बचाने की मुहिम अब सोशल मीडिया से सड़क तक पहुंच चुकी है। #AravaliProtection हैशटैग के जरिए लोग फोटो, वीडियो और जमीनी हालात साझा कर रहे हैं, ताकि इस मुद्दे पर सार्वजनिक दबाव बना रहे। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि डिजिटल अभियान ने अरावली विवाद को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना दिया है।

माउंट आबू से ‘अरावली बचाओ’ आंदोलन की शुरुआत

इसी कड़ी में, माउंट आबू से ‘अरावली बचाओ आंदोलन’ की नई शुरुआत की जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ता निर्मल चौधरी के नेतृत्व में शुरू हो रहा यह पैदल मार्च करीब 1000 किलोमीटर की दूरी तय करेगा। यह यात्रा अरावली क्षेत्र के सैकड़ों गांवों से होकर गुजरेगी और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देगी।

आंदोलन की शुरुआत माउंट आबू स्थित अर्बुदा देवी मंदिर से होगी। नक्की झील की आरती के बाद पैदल मार्च विभिन्न क्षेत्रों की ओर रवाना होगा। आयोजकों के अनुसार, यह आंदोलन सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के विरोध और पुनर्विचार की मांग को लेकर किया जा रहा है।

पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनी

पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेताया है कि अरावली की बड़े पैमाने पर कटाई से मिट्टी कटाव, जलस्तर में गिरावट और जलवायु परिवर्तन के स्थानीय प्रभाव तेजी से बढ़ सकते हैं। अरावली पर्वतमाला को उत्तर भारत की ग्रीन वॉल माना जाता है, जो मरुस्थलीकरण को रोकने में अहम भूमिका निभाती है।

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नई परिभाषा से 90% अरावली पर खतरा?

विवाद की जड़ सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश है, जिसमें अरावली की नई परिभाषा तय की गई है। इस परिभाषा के अनुसार, केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियां ही संरक्षित मानी जाएंगी। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का दावा है कि इससे राजस्थान में अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है, जिससे बड़े पैमाने पर खनन का रास्ता खुलने की आशंका है।

स्थानीय अधिकार बनाम विकास की बहस

अरावली विवाद ने एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की बहस को तेज कर दिया है। जहां प्रशासन और नीति-निर्माता नियामकीय ढांचे की बात कर रहे हैं, वहीं स्थानीय लोग और विशेषज्ञ अरावली को जीवन रेखा बताते हुए इसके पूर्ण संरक्षण की मांग कर रहे हैं।

फिलहाल, अरावली की सुरक्षा राजस्थान में सर्वोच्च प्राथमिकता बन चुकी है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर और तीखा होने की संभावना है।

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