मुनंबम भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई, जिसमें जमीन को वक्फ घोषित किया गया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने जांच आयोग की रिपोर्ट को बरकरार रखते हुए केरल सरकार को नोटिस जारी किया और विवादित 404 एकड़ भूमि पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया।
मुनंबम भूमि विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने विवादित 404 एकड़ भूमि पर वक्फ घोषित करने पर लगाई रोक, जांच आयोग की रिपोर्ट बरकरार
मुनंबम भूमि विवाद में एक अहम हस्तक्षेप करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें एर्णाकुलम जिले के मुनंबम क्षेत्र की भूमि को वक्फ घोषित किए जाने को “केरल वक्फ बोर्ड की जमीन हड़पने की रणनीति” करार दिया गया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस विवादित भूमि के स्वामित्व की जांच के लिए गठित जांच आयोग की रिपोर्ट को बरकरार रखा है और इस संबंध में केरल सरकार को नोटिस जारी किया है।
हाईकोर्ट के आदेश पर आंशिक रोक
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने स्पष्ट किया कि विवादित भूमि के स्वामित्व और प्रकृति का निर्धारण फिलहाल वक्फ न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र में है। ऐसे में हाईकोर्ट का इस मुद्दे पर टिप्पणी करना उसके अधिकार क्षेत्र से परे प्रतीत होता है।
पीठ ने कहा कि भूमि के स्वरूप का प्रश्न न्यायाधिकरण के समक्ष लंबित है और हाईकोर्ट इस स्तर पर उपयुक्त मंच नहीं है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने विवादित 404 एकड़ भूमि पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।
जांच आयोग की रिपोर्ट बरकरार
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उस हिस्से पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें केरल हाईकोर्ट ने भूमि विवाद की जांच के लिए गठित जांच आयोग के गठन को वैध ठहराया था। कोर्ट ने कहा कि जांच आयोग की रिपोर्ट पहले ही राज्य सरकार को सौंपी जा चुकी है और इस स्तर पर उस प्रक्रिया में हस्तक्षेप उचित नहीं होगा।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद एर्णाकुलम जिले के चेराई और मुनंबम गांवों से जुड़ा है, जहां स्थानीय निवासियों—जिनमें बड़ी संख्या में मछुआरे और आर्थिक रूप से कमजोर लोग शामिल हैं—ने आरोप लगाया है कि केरल वक्फ बोर्ड उनके वैध पंजीकृत दस्तावेजों और नियमित भूमि कर भुगतान के बावजूद उनकी जमीन और संपत्तियों पर दावा कर रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्ष 2019 में अचानक उनकी भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया गया, जबकि वे दशकों से वहां रह रहे हैं।
वक्फ बोर्ड की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने उन मुद्दों पर टिप्पणियां की हैं, जो विशेष रूप से वक्फ न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उन्होंने कहा कि वक्फ विलेख की वैधता और भूमि की प्रकृति जैसे प्रश्नों पर हाईकोर्ट की टिप्पणियां अनुचित हैं क्योंकि ये विषय विचाराधीन थे।
राज्य सरकार और स्थानीय निवासियों का पक्ष
केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने वक्फ बोर्ड की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि संबंधित वक्फ के मुतवल्ली ने न तो जांच आयोग के गठन पर आपत्ति की और न ही हाईकोर्ट में कोई चुनौती दी।
स्थानीय निवासियों की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि ये लोग गरीब मछुआरे हैं, जिनकी आवाज वर्षों तक नहीं सुनी गई। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चूंकि जांच आयोग अपनी रिपोर्ट सौंप चुका है, इसलिए अब उस प्रक्रिया को चुनौती देना निरर्थक हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस मनोज मिश्रा ने टिप्पणी की,
“ऐसा प्रतीत होता है कि हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्य किया है।”
जस्टिस उज्जल भुइयां ने भी सवाल उठाया कि क्या भूमि के स्वरूप जैसे विवादित मुद्दों पर निर्णय देने के लिए हाईकोर्ट उपयुक्त मंच है।
आगे की कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार को नोटिस जारी करते हुए 27 जनवरी 2025 से शुरू होने वाले सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। तब तक विवादित संपत्ति पर यथास्थिति बनी रहेगी।
यह मामला वक्फ कानून, भूमि अधिकार और न्यायाधिकरण बनाम उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को लेकर भविष्य में महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल साबित हो सकता है।
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