सुप्रीम कोर्ट ने UP बार काउंसिल पर मौखिक इंटरव्यू के नाम पर ₹2,500 वसूलकर अपने आदेशों को दरकिनार करने के आरोपों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने नोटिस जारी कर 7 जनवरी 2026 तक जवाब मांगा और BCI को जांच का निर्देश दिया।
“UP बार काउंसिल पर गंभीर आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब”
UP बार काउंसिल द्वारा मौखिक इंटरव्यू के नाम पर ₹2,500 की वसूली : गंभीर आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने आदेशों को दरकिनार करने पर कड़ा रुख अपनाया
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल द्वारा एडवोकेट एनरोलमेंट प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए मामले पर गहरी ‘चिंता’ और ‘आश्चर्य’ व्यक्त किया है। अदालत के समक्ष यह आरोप सामने आया कि बार काउंसिल ने मौखिक इंटरव्यू की आड़ में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों को दरकिनार कर दिया है और प्रत्येक उम्मीदवार से ₹2,500 वसूले जा रहे हैं—जबकि कानून इसकी अनुमति नहीं देता।
गौरव कुमार जजमेंट का उल्लंघन?
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की द्वि-न्यायाधीशीय पीठ के समक्ष दाखिल प्रियदर्शिनी साहा बनाम पिनाकी रंजन बनर्जी मामले की सुनवाई में यह गंभीर आरोप सामने आया।
याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि यह कथित “इंटरव्यू शुल्क” सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट के 30 जुलाई 2024 के ऐतिहासिक फैसले—गौरव कुमार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (W.P.(C) 352/2023)—का उल्लंघन है।
उस जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा था:
- एनरोलमेंट शुल्क सामान्य वर्ग के लिए अधिकतम ₹750 हो सकता है
- SC/ST उम्मीदवारों के लिए ₹125 से अधिक नहीं
- बार काउंसिल किसी भी रूप में—प्रत्यक्ष या परोक्ष—अतिरिक्त शुल्क नहीं ले सकती
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि इन सीमाओं से अधिक शुल्क लेना अवैध और Advocates Act, 1961 की धारा 24 का सीधा उल्लंघन है।
मौखिक इंटरव्यू के नाम पर ₹2,500? सुप्रीम कोर्ट ‘हैरान’
पीठ के समक्ष कहा गया कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल अब उम्मीदवारों से मौखिक इंटरव्यू के लिए ₹2,500 मांग रही है, जो कथित रूप से “बाईपास मैकेनिज़्म” है—यानी न्यायालय के आदेश को दरकिनार करने की एक कोशिश।
पीठ ने टिप्पणी की:
“ये आरोप अत्यंत चौंकाने वाले हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को नोटिस जारी किया, जिसकी अगली तारीख 7 जनवरी 2026 तय की गई। बार काउंसिल के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड ने औपचारिक नोटिस को स्वीकार भी कर लिया।
BCI को भी हस्तक्षेप के निर्देश
अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को यह मुद्दा गंभीरता से जांचने और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल से संवाद कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि यह मामला केवल एक राज्य बार काउंसिल के आचरण का नहीं, बल्कि देशभर में वकीलों के एनरोलमेंट की पारदर्शिता और कानून के पालन को प्रभावित करता है।
कंटेम्प्ट पिटीशन भी हुई स्वीकार
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस मामले से जुड़ी एक अवमानना याचिका पर भी नोटिस जारी किया।
काउंसल कुनाल चटर्जी की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कंटेम्प्ट पिटीशन दाखिल करने की अनुमति दी। आरोपित व्यक्तियों की व्यक्तिगत उपस्थिति—फिलहाल—माफ कर दी गई है।
मामला क्यों है महत्वपूर्ण?
यह पूरा विवाद मूल रूप से इस प्रश्न पर केंद्रित है—
क्या बार काउंसिल इंटरव्यू जैसे अतिरिक्त तंत्र बनाकर एनरोलमेंट शुल्क सीमा का उल्लंघन कर सकती है?
यदि आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह—
- सुप्रीम कोर्ट की अवमानना,
- Advocates Act के प्रावधानों का उल्लंघन, और
- एनरोलमेंट प्रक्रिया में पारदर्शिता पर गंभीर सवाल
खड़े करता है।
7 जनवरी 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में—
- UP बार काउंसिल अपना हलफ़नामा दाखिल करेगी,
- BCI अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा,
और यह स्पष्ट हो सकेगा कि क्या शुल्क वसूली का यह कथित तंत्र वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को दरकिनार करने का प्रयास था।
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