सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि सात साल की वकालत पूरी कर चुके न्यायिक अधिकारी अब बार कोटा के तहत जिला जज बनने के पात्र होंगे। कोर्ट ने संविधान की व्याख्या को ‘जीवंत और लचीला’ बताते हुए सभी राज्यों को नियम संशोधित करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: 7 साल की वकालत कर चुके न्यायिक अधिकारी अब बार कोटा के तहत जिला जज बनने के होंगे पात्र
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: न्यायिक अधिकारी भी अब बार कोटा से जिला जज बन सकेंगे
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि सात वर्ष की वकालत (practice) पूरी कर चुके न्यायिक अधिकारी (Judicial Officers) अब बार कोटा (Bar Quota) के तहत जिला जज (District Judge) बनने के पात्र होंगे।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि संविधान की व्याख्या कठोर (pedantic) नहीं बल्कि जीवंत और लचीली (organic) होनी चाहिए ताकि न्यायपालिका की कार्यप्रणाली समय के साथ सशक्त और समावेशी बन सके।
संविधान की लचीली व्याख्या और न्यायिक संतुलन
पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने कहा कियह फैसला न्यायिक सेवा (Judicial Service) और बार (Bar) दोनों के अधिकारों के बीच संविधान-सम्मत संतुलन बनाए रखेगा।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सभी राज्य सरकारें अपने-अपने नियमों में संशोधन करें और संबंधित हाई कोर्ट से परामर्श लेकर ऐसा प्रावधान जोड़े जिससे योग्य न्यायिक अधिकारी भी बार कोटा के तहत जिला जज की परीक्षा में शामिल हो सकें।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा —
“संविधान का उद्देश्य न्यायिक संस्थानों में गुणवत्ता, विविधता और अनुभव का समावेश करना है। बार और बेंच — दोनों न्यायिक दक्षता के दो स्तंभ हैं।”
न्यूनतम आयु सीमा 35 वर्ष तय, फैसला भविष्य के लिए लागू
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय आगे से (prospective effect) लागू होगा।
इसका अर्थ है कि यह फैसला पहले से पूरी हो चुकी भर्ती प्रक्रियाओं या नियुक्तियों पर असर नहीं डालेगा।
समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट ने कहा कि जिला जज परीक्षा के उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम आयु सीमा 35 वर्ष रखी जाए, ताकि न्यायिक सेवा और बार दोनों वर्गों के बीच समान प्रतिस्पर्धा बनी रहे।
पृष्ठभूमि: केरल हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
यह विवाद 2019 में केरल हाई कोर्ट के एक आदेश से शुरू हुआ था।
एक उम्मीदवार, जो पहले वकील था और बाद में मुनसिफ (निचली अदालत का जज) बन गया, ने जिला जज की सीधी भर्ती परीक्षा (Direct Recruitment) में भाग लिया।
हाई कोर्ट ने उसकी नियुक्ति रद्द करते हुए कहा कि वह “बार कोटा” का उम्मीदवार नहीं हो सकता, क्योंकि आवेदन के समय वह वकील नहीं था।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां “धीरेज मोर बनाम हरियाणा राज्य” (Dheeraj Mor v. State of Haryana) में बनी व्याख्या की पुनः समीक्षा की मांग की गई।
अब संविधान पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि वकालत और न्यायिक सेवा दोनों का अनुभव न्यायिक दक्षता में समान रूप से योगदान देता है, इसलिए उन्हें अलग-अलग नहीं बल्कि पूरक रूप में देखा जाना चाहिए।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
- कुशल उम्मीदवारों को अवसर देना न्याय के हित में:
कोर्ट ने कहा कि युवा, योग्य और सक्षम न्यायिक अधिकारियों को जिला जज बनने से रोकना न्यायिक प्रतिभा का नुकसान होगा। - बार कोटा के लिए कोई आरक्षण नहीं:
संविधान के अनुच्छेद 233(2) में बार उम्मीदवारों के लिए किसी प्रतिशत या आरक्षण का प्रावधान नहीं है। यह केवल पात्रता निर्धारित करता है। - सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार का चयन सर्वोच्च प्राथमिकता:
कोर्ट ने कहा कि किसी भी सार्वजनिक सेवा में योग्यता (merit) ही चयन का प्रमुख मानदंड होना चाहिए। उद्देश्य हमेशा “सबसे उपयुक्त और सक्षम व्यक्ति का चयन” होना चाहिए।
कानूनी और प्रशासनिक प्रभाव
यह फैसला न्यायिक भर्ती प्रक्रिया में संरचनात्मक बदलाव ला सकता है।
अब राज्य न्यायिक सेवाओं को अपने नियमों में संशोधन कर न्यायिक अधिकारियों के लिए बार कोटा के रास्ते जिला जज बनने का मार्ग खोलना होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय न्यायिक कैडर में अनुभव, विविधता और दक्षता को बढ़ाएगा और भारत में न्यायपालिका के पेशेवर विकास के नए अध्याय की शुरुआत करेगा।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय “बार और बेंच के बीच समानता” के संवैधानिक सिद्धांत को मजबूत करता है। अब सात वर्ष की वकालत पूरी कर चुके न्यायिक अधिकारी भी जिला जज बनने के लिए प्रतिस्पर्धा में शामिल हो सकेंगे — यह कदम न्यायपालिका को अधिक समावेशी और योग्यता-आधारित दिशा में आगे बढ़ाएगा।
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