ढाई साल की देरी और विरोधाभास पर राहत—दिल्ली हाई कोर्ट ने 57 वर्षीय दुष्कर्म आरोपी को जमानत दी

Like to Share

ढाई साल की देरी और विरोधाभास पर राहत—दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म आरोपी को जमानत दी

दिल्ली हाई कोर्ट ने 57 वर्षीय दुष्कर्म आरोपी को जमानत देते हुए एफआईआर में ढाई साल की देरी और शिकायतों में विरोधाभास को अहम माना। कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी की स्वतंत्रता छीनी नहीं जा सकती।


दिल्ली हाई कोर्ट से आरोपी को जमानत

दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार 57 वर्षीय व्यक्ति को जमानत दे दी है। न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने आरोपी खेम कुमार को 40,000 रुपये के निजी मुचलके और समान राशि के एक जमानती पर रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने कुछ अतिरिक्त शर्तें भी लगाई हैं।

कोर्ट ने यह राहत देते हुए मामले में दर्ज एफआईआर में असामान्य देरी और शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास को महत्वपूर्ण माना।


आरोप: शादी का झांसा देकर दुष्कर्म

शिकायतकर्ता, जो 50 वर्ष से अधिक आयु की महिला हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं तथा विदेश में भी अध्ययन कर चुकी हैं, ने आरोप लगाया कि आरोपी—जो 1990 के दशक में उनका सहपाठी था—ने मई 2023 में शादी का झांसा देकर उनके साथ दुष्कर्म किया।

महिला का कहना था कि वर्ष 2023 में अपने माता-पिता से अलग होने के बाद आरोपी ने उनके लिए एक आवास की व्यवस्था की, जहां यह घटना हुई। हालांकि, इस संबंध में एफआईआर दिसंबर 2025 में रन्होला थाने में दर्ज कराई गई।


कोर्ट ने देरी और परिपक्वता को माना अहम

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि कथित यौन संबंध की पहली घटना और एफआईआर दर्ज होने के बीच ढाई साल से अधिक का अंतर है। कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों पक्ष परिपक्व और शिक्षित हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

Must Read -  जेजे एक्ट की धारा 94(2) उम्र के निर्धारण के लिए, स्कूल जन्मतिथि प्रमाण पत्र को सर्वोच्च स्थान और ऑसिफिकेशन टेस्ट को अंतिम पायदान पर रखा गया है-SC

कोर्ट ने कहा कि इस तरह की देरी और परिस्थितियां जमानत पर विचार करते समय प्रासंगिक हैं, खासकर तब जब मामला ट्रायल के अधीन हो।


शिकायतों में विरोधाभास पर कोर्ट की टिप्पणी

हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता ने पहले दर्ज की गई एक अलग शिकायत में दुष्कर्म का आरोप नहीं लगाया था। 14 मई 2023 को द्वारका सेक्टर-9 के एसएचओ को दी गई शिकायत में ऐसे किसी आरोप का उल्लेख नहीं था।

अदालत ने यह भी नोट किया कि एफआईआर दर्ज कराने से एक दिन पहले एक अन्य थाने में की गई शिकायत में भी यौन उत्पीड़न या दुष्कर्म का कोई जिक्र नहीं था। कोर्ट के अनुसार, यह परिस्थितियां प्रथम दृष्टया आरोपों में असंगति दर्शाती हैं।


चार्जशीट दाखिल, हिरासत जरूरी नहीं: कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि मामले में चार्जशीट पहले ही दाखिल की जा चुकी है और जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा पूरा हो चुका है। ऐसे में आरोपी को ट्रायल लंबित रहने तक जेल में रखना उचित नहीं होगा।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत का उद्देश्य आरोपी को अनावश्यक रूप से स्वतंत्रता से वंचित करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वह ट्रायल के दौरान न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करे।


बचाव पक्ष और राज्य की दलीलें

आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि एफआईआर में लगाए गए आरोप शिकायतकर्ता की पूर्व शिकायतों से मेल नहीं खाते। उन्होंने कहा कि मई 2023 की घटनाओं के संबंध में तत्काल कोई स्पष्ट आरोप दर्ज नहीं किया गया था।

Must Read -  सुप्रीम कोर्ट: उपभोक्ता आयोग में सुनी जा रहीं शिकायतें, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायलय में स्थानांतरित नहीं हो सकती-

वहीं राज्य की ओर से यह कहा गया कि शिकायतकर्ता को यह विश्वास दिलाया गया था कि आरोपी एक खुफिया एजेंसी का अधिकारी है और तलाकशुदा है, जिससे वह भ्रम में रही। अदालत ने कहा कि इस पहलू की जांच ट्रायल के दौरान की जाएगी।


अदालत का निष्कर्ष

सभी परिस्थितियों—एफआईआर में देरी, शिकायतों में विरोधाभास और चार्जशीट दाखिल होने—को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने का निर्णय लिया।

अदालत ने कहा कि ट्रायल के दौरान साक्ष्यों का परीक्षण होगा, लेकिन फिलहाल आरोपी को हिरासत में रखना आवश्यक नहीं है। यह आदेश एक बार फिर इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि जमानत पर निर्णय लेते समय अदालतें केवल आरोपों की गंभीरता ही नहीं बल्कि परिस्थितिजन्य तथ्यों और साक्ष्यों की संगति को भी महत्व देती हैं।


Tags:
#DelhiHighCourt #BailOrder #RapeCase #FIRDelay #CriminalLaw #IndianJudiciary #CourtOrder #LegalNews #BailGranted #JusticePrateekJalan #LawUpdate

Leave a Comment