नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि अनुसूचित अपराध में FIR के बिना PMLA के तहत कार्यवाही टिकाऊ नहीं है।
FIR के बिना मनी लॉन्ड्रिंग केस नहीं: नेशनल हेराल्ड मामले में ED को बड़ा झटका
नेशनल हेराल्ड केस: FIR के बिना PMLA कार्यवाही असंवैधानिक, दिल्ली कोर्ट ने ED की शिकायत पर संज्ञान से इनकार
नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) को एक बड़ा कानूनी झटका लगा है। दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने मंगलवार को ED द्वारा दायर अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि अनुसूचित (predicate) अपराध में FIR दर्ज हुए बिना PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही कानूनी रूप से बनाए नहीं रखी जा सकती।
यह फैसला विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने एक विस्तृत आदेश में दिया, जिसमें कहा गया कि धारा 3 और 4, PMLA के तहत जांच और अभियोजन तभी संभव है जब आधारभूत अपराध में विधिवत FIR दर्ज हो। केवल एक निजी शिकायत और उस पर पारित समन आदेश के आधार पर PMLA की कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती।
निजी शिकायत बनाम FIR: अदालत की स्पष्ट रेखा
अदालत ने कहा कि FIR की जांच क्षमता, दंड प्रक्रिया संहिता (अब BNSS) की धारा 223 के तहत दायर निजी शिकायत से गुणात्मक रूप से कहीं अधिक व्यापक और प्रभावी होती है। FIR न केवल जांच एजेंसी को व्यापक अधिकार देती है, बल्कि वह PMLA ढांचे के तहत ECIR दर्ज करने और अभियोजन शिकायत दाखिल करने की “क्षेत्राधिकार संबंधी पूर्व-शर्त” भी है।
अदालत ने रेखांकित किया कि नेशनल हेराल्ड मामले में ED की पूरी कार्यवाही भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर निजी शिकायत और वर्ष 2014 के समन आदेश पर आधारित थी, न कि किसी पंजीकृत FIR पर। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी निजी शिकायत, PMLA के तहत FIR की वैधानिक आवश्यकता का विकल्प नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट और FATF सिद्धांतों का हवाला
विशेष न्यायाधीश ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध “अनुसूचित अपराध से अविभाज्य रूप से जुड़ा” होता है। जब तक आधारभूत अपराध विधिवत दर्ज और जांच योग्य न हो, तब तक मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही स्वतः कमजोर हो जाती है।
इसके साथ ही अदालत ने FATF (Financial Action Task Force) के सिद्धांतों का भी उल्लेख किया और कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार भी मनी लॉन्ड्रिंग की जांच किसी ठोस और विधिसम्मत आधार अपराध पर टिकी होनी चाहिए।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि ED का विभिन्न मंचों पर लगातार यह रुख रहा है कि FIR मनी लॉन्ड्रिंग कार्यवाही की अनिवार्य शर्त है, और वर्तमान मामले में उसी मानक से विचलन किया गया।
संज्ञान से इनकार, लेकिन जांच के दरवाज़े खुले
हालांकि अदालत ने ED की शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि वह आरोपों के गुण-दोष (merits) की जांच नहीं कर रही है। अदालत ने ध्यान दिलाया कि कार्यवाही के दौरान 3 अक्टूबर 2025 को दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा एक FIR दर्ज की गई थी।
न्यायालय ने कहा कि ED और EOW कानून के अनुसार आगे की जांच करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन मौजूदा अभियोजन शिकायत, जिस रूप में वह दायर की गई थी, कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।
बचाव पक्ष की प्रतिक्रिया: “अजीबतम केस”
आदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे “पूरी तरह deserved victory” करार दिया। उन्होंने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा कि यह “अब तक का सबसे अजीब मामला” है, जिसमें भारी-भरकम मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए गए, जबकि न तो धन का कोई लेन-देन दिखाया गया और न ही किसी अचल संपत्ति का हस्तांतरण।
सिंघवी ने यह भी कहा कि एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) अब यंग इंडियन के स्वामित्व में है, जो एक नॉट-फॉर-प्रॉफिट कंपनी है और जो लाभ, डिविडेंड या किसी प्रकार के निजी फायदे का वितरण नहीं कर सकती।
अगली सुनवाई 16 जनवरी 2026
अदालत ने यह भी दोहराया कि आरोपियों को BNSS की धारा 223 के तहत संज्ञान से पहले सुने जाने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। मामले को अब 16 जनवरी 2026 के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
यह आदेश न केवल नेशनल हेराल्ड मामले में बल्कि PMLA के तहत भविष्य की जांचों के लिए भी एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है, जिसमें FIR की अनिवार्यता को फिर से रेखांकित किया गया है।
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