कलकत्ता हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मुकुल रॉय विधायक पद से अयोग्य घोषित

🧾 कलकत्ता हाईकोर्ट ने बीजेपी से निर्वाचित होकर TMC में शामिल हुए मुकुल रॉय को विधायक पद से अयोग्य घोषित किया। अदालत ने स्पीकर की पक्षपातपूर्ण भूमिका की आलोचना की और दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) की संवैधानिक मर्यादा को बरकरार रखा। सुवेंदु अधिकारी ने इस निर्णय को “लोकतंत्र की जीत” बताया।

📰 “कलकत्ता हाईकोर्ट ने मुकुल रॉय को विधायक पद से अयोग्य ठहराया | सुवेंदु अधिकारी की याचिका पर ऐतिहासिक फैसला”

कलकत्ता हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मुकुल रॉय विधायक पद से अयोग्य घोषित

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में पश्चिम बंगाल विधानसभा के विधायक मुकुल रॉय को दलबदल (defection) के आधार पर विधायक पद से अयोग्य (disqualified) घोषित कर दिया। यह फैसला राज्य में पहली बार किसी संवैधानिक अदालत द्वारा प्रत्यक्ष रूप से दलबदल के मामले में दिया गया है, जो राजनीतिक और संवैधानिक दृष्टि से अभूतपूर्व मिसाल मानी जा रही है।

यह आदेश न्यायमूर्ति देबांगसु बसाक और न्यायमूर्ति मोहम्मद शब्बार राशिदी की खंडपीठ ने पारित किया। अदालत ने विपक्ष के नेता और भाजपा विधायक सुवेंदु अधिकारी द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया।


🔹 पृष्ठभूमि: बीजेपी BJP से टीएमसी TMC में शामिल हुए थे मुकुल रॉय

मुकुल रॉय ने मई 2021 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के टिकट पर जीत हासिल की थी। लेकिन अगस्त 2021 में वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी की मौजूदगी में तृणमूल कांग्रेस (TMC) में शामिल हो गए थे।

इस कदम के बाद विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने विधानसभा स्पीकर के समक्ष दलबदल कानून (Tenth Schedule of the Constitution) के तहत याचिका दाखिल की थी, जिसमें मुकुल रॉय को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई थी।

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स्पीकर ने इस याचिका पर लंबे समय तक कोई निर्णय नहीं लिया, जिसके बाद अधिकारी ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


🔹 कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि स्पीकर की निष्क्रियता और देरी संविधान की आत्मा के खिलाफ है। अदालत ने पाया कि स्पीकर ने मुकुल रॉय के मामले में राजनीतिक पक्षपात दिखाया और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता से समझौता किया।

खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि:

“संविधान के दसवीं अनुसूची की पवित्रता और लोकतंत्र की बुनियादी भावना तभी सुरक्षित रह सकती है जब स्पीकर का निर्णय निष्पक्ष और समयबद्ध हो।”

कोर्ट ने स्पीकर के आदेश को अवैध घोषित करते हुए निरस्त किया और मुकुल रॉय को विधायक पद से तत्काल प्रभाव से अयोग्य करार दिया।


🔹 सुवेंदु अधिकारी ने फैसले को बताया “लोकतंत्र की जीत”

निर्णय के बाद सुवेंदु अधिकारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे “ऐतिहासिक निर्णय” बताया।

उन्होंने लिखा —

“यह फैसला लोकतंत्र में विश्वास बहाल करता है और यह दिखाता है कि सच देर से सही, पर जीतता है। कोर्ट ने संविधान की मर्यादा और दसवीं अनुसूची की गरिमा को सुरक्षित रखा।”

अधिकारी ने आगे कहा कि यह निर्णय स्पीकर की “पक्षपातपूर्ण भूमिका को उजागर करता है”, जिसने राजनीतिक प्रभाव में आकर दलबदल याचिका पर निर्णय लेने में देरी की थी।


🔹 संवैधानिक महत्व

यह निर्णय भारत में किसी उच्च न्यायालय द्वारा दलबदल विरोधी कानून के तहत विधायक की अयोग्यता तय करने का पहला उदाहरण माना जा रहा है। आमतौर पर यह अधिकार स्पीकर या चेयरमैन को होता है, लेकिन इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप को अदालत ने संवैधानिक औचित्य के आधार पर उचित ठहराया।

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यह फैसला विधानसभा स्पीकर की भूमिका, दल-बदल विरोधी कानून के प्रवर्तन, और न्यायिक समीक्षा के दायरे को लेकर आने वाले समय में महत्वपूर्ण नजीर (precedent) के रूप में उद्धृत किया जाएगा।


⚖️ निष्कर्ष

कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल पश्चिम बंगाल की राजनीति बल्कि संवैधानिक कानून के क्षेत्र में भी ऐतिहासिक माना जा रहा है।
अदालत ने यह संदेश दिया है कि लोकतंत्र की जड़ें तब तक मजबूत नहीं हो सकतीं जब तक दलबदल और राजनीतिक पक्षपात पर सख्त रोक न लगे।


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