‘गुजरात हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के आरोपों में बर्खास्त जज को किया बहाल, साक्ष्य के अभाव में अनुशासनात्मक कार्यवाही को बताया अन्यायपूर्ण’

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‘Gujarat High Court reinstates judge dismissed on corruption charges, calls disciplinary action unjust due to lack of evidence

गुजरात उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में भ्रष्टाचार के आरोपों में बर्खास्त किए गए एक अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति एएस सुपेहिया और न्यायमूर्ति आरटी वच्छानी की खंडपीठ ने कहा कि बर्खास्तगी का आदेश किसी भी वैध साक्ष्य पर आधारित नहीं था और यह केवल अनुमान, धारणाओं और अनुशासनात्मक प्राधिकारी की दृष्टिकोण पर आधारित था।

🔍 पृष्ठभूमि:

याचिकाकर्ता, जो उस समय अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश और जेएमएफसी के रूप में कार्यरत थे, पर आरोप था कि उन्होंने एस्सार ऑयल लिमिटेड से जुड़े एक दीवानी विवाद में वादी के पक्ष में पक्षपातपूर्ण आदेश पारित किए। उन्हें भ्रष्टाचार, कर्तव्य में लापरवाही और अनुचित आचरण के लिए आरोपपत्र जारी किया गया था। आरोप था कि उन्होंने वादी को टैंकरों का अवैध कब्जा दिलाने में मदद की।

मामला उस समय उठा जब एक आगजनी की घटना के बाद एस्सार के ठेकेदार द्वारा वादी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई थी। याचिकाकर्ता द्वारा उस बीच दिए गए न्यायिक आदेशों को लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई।

⚖️ न्यायालय का विश्लेषण:

खंडपीठ ने कहा कि न तो ऐसा कोई दस्तावेज है और न ही मौखिक साक्ष्य जिससे यह प्रमाणित हो कि याचिकाकर्ता ने निजी लाभ, भ्रष्ट उद्देश्य या बाहरी दबाव में आदेश पारित किए। अदालत ने यह भी पाया कि:

  • अभियोग आवेदन को कभी चुनौती नहीं दी गई;
  • मुकदमा बिना शर्त वापस ले लिया गया;
  • अनुशासनात्मक कार्रवाई मात्र न्यायिक आदेशों को आधार बनाकर की गई, जो कि न्यायिक स्वायत्तता पर सीधा प्रहार है।
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📚 सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टांत पर भरोसा:

कोर्ट ने पीसी जोशी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [(2001) 6 SCC 491] मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का हवाला देते हुए दोहराया कि जब तक भ्रष्टाचार, कदाचार, पक्षपात या निजी लाभ के ठोस साक्ष्य न हों, तब तक किसी न्यायिक आदेश को अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता।

🧾 निर्णय:

कोर्ट ने 6 मई 2011 की अधिसूचना, जिसके तहत बर्खास्तगी का आदेश जारी किया गया था, को रद्द कर दिया। अदालत ने इसे न केवल अन्यायपूर्ण बल्कि “कानूनन असमर्थित” ठहराया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को छह सप्ताह के भीतर सेवा में बहाल किया जाए। हालांकि, उनकी सेवा बहाली उस अन्य विभागीय जांच की शर्त पर होगी, जिसे पहले स्थगित किया गया था।


📌 मामला: एमजे इंद्रेकर बनाम गुजरात राज्य
📌 याचिका संख्या: विशेष सिविल आवेदन सं. 8467/2011
📌 खंडपीठ: जस्टिस एएस सुपेहिया और जस्टिस आरटी वच्छानी

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