धोनी को 10 लाख रुपये जमा करने का निर्देश: मद्रास हाई कोर्ट ने सीडी ट्रांसक्रिप्शन के लिए लगाया शुल्क

एमएस धोनी को 10 लाख रुपये जमा करने का निर्देश

मद्रास हाई कोर्ट ने क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी को Retd IPS Officer संपत कुमार के खिलाफ दायर 100 करोड़ की मानहानि याचिका से संबंधित सीडी के ट्रांसक्रिप्शन हेतु 10 लाख रुपये जमा करने का निर्देश दिया।

मद्रास हाई कोर्ट ने भारतीय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी को निर्देश दिया है कि वे रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी संपत कुमार के खिलाफ दायर मानहानि मामले से संबंधित एक सीडी के लिप्यंतरण (ट्रांसक्रिप्शन) के लिए 10 लाख रुपये 12 मार्च 2026 तक जमा करें।

जस्टिस आर.एन. मंजुला ने सुनवाई के दौरान कहा कि संबंधित सीडी को लिखित रूप में परिवर्तित करने के लिए एक अनुवादक और एक टाइपिस्ट को लगभग तीन से चार महीने तक पूर्णकालिक रूप से कार्य करना होगा। इसके अतिरिक्त अनूदित दस्तावेजों की प्रतिलिपि तैयार करने में भी अतिरिक्त व्यय आएगा।


100 करोड़ रुपये का मानहानि दावा

महेंद्र सिंह धोनी ने वर्ष 2014 में रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी संपत कुमार के खिलाफ 100 करोड़ रुपये का मानहानि दावा दायर किया था। आरोप है कि वर्ष 2013 में आईपीएल सट्टेबाजी विवाद पर एक निजी टीवी चैनल की बहस के दौरान संपत कुमार ने चेन्नई टीम के खिलाड़ी धोनी को भी इस प्रकरण से जोड़कर टिप्पणी की थी।

धोनी का कहना है कि इन टिप्पणियों से उनकी प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुंची।


पहले भी दिया गया था ट्रांसक्रिप्शन का आदेश

हाई कोर्ट ने पहले ही निर्देश दिया था कि मामले से संबंधित सीडी को आवश्यक शुल्क के भुगतान के अधीन लिखित रूप में ट्रांसक्राइब किया जाए।

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सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि चूंकि कार्य समयसाध्य और तकनीकी प्रकृति का है, इसलिए इसके लिए पर्याप्त संसाधन और समर्पित समय की आवश्यकता होगी।


मुख्य न्यायाधीश राहत कोष में जमा होगी राशि

अदालत ने निर्देश दिया कि:

  • धोनी 12 मार्च तक 10 लाख रुपये मुख्य न्यायाधीश राहत कोष (Chief Justice’s Relief Fund) में जमा करें।
  • अनुवादक और टाइपिस्ट को मार्च के तीसरे सप्ताह तक ट्रांसक्रिप्शन कार्य पूरा करना होगा।
  • मामले की अगली सुनवाई 12 मार्च को होगी।

प्रक्रियात्मक आदेश, विवाद का नहीं निपटारा

यह आदेश मामले के गुण-दोष (merits) पर नहीं, बल्कि साक्ष्य के उचित प्रस्तुतीकरण की प्रक्रिया से संबंधित है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक निर्णय के लिए रिकॉर्ड का लिखित रूप में उपलब्ध होना आवश्यक है।


यह मामला एक बार फिर दर्शाता है कि उच्च न्यायालय साक्ष्य की शुद्धता और प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर कितने सतर्क हैं, विशेषकर तब जब मामला उच्च-प्रोफ़ाइल व्यक्तियों से जुड़ा हो।


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