POCSO कोर्ट ने 8 साल की अनाथ बच्ची के यौन उत्पीड़न मामले में 72 वर्षीय व्यक्ति को 20 साल की सजा सुनाई
दिल्ली की POCSO कोर्ट ने 8 साल की अनाथ बच्ची के यौन उत्पीड़न मामले में 72 वर्षीय व्यक्ति को 20 साल की सजा सुनाई। कोर्ट ने कहा ऐसे अपराध सिर्फ अपराध नहीं बल्कि बचपन और समाज के विश्वास पर हमला हैं।
8 साल की बच्ची से यौन उत्पीड़न: 72 वर्षीय दोषी को 20 साल की सजा
दिल्ली की एक विशेष पॉक्सो अदालत ने आठ साल की अनाथ बच्ची के यौन उत्पीड़न के मामले में 72 वर्षीय व्यक्ति को 20 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने मामले पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे अपराध केवल आपराधिक कृत्य नहीं बल्कि “बचपन पर हमला” हैं।
यह फैसला Fast Track Special Court (POCSO) Tis Hazari की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश Babita Puniya ने सुनाया।
अदालत की कड़ी टिप्पणी: समाज में बच्चे सुरक्षित नहीं
सजा सुनाते समय अदालत ने 24 मार्च को अपने आदेश में कहा कि यह बेहद डरावनी स्थिति है कि समाज में बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। अदालत ने दोषी जैसे लोगों को “गिद्ध” बताते हुए कहा कि वे अपनी हवस मिटाने के लिए बच्चों पर नजर रखते हैं।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इस तरह के अपराध केवल किसी एक बच्चे के खिलाफ अपराध नहीं होते, बल्कि यह बचपन, समाज और देश के भविष्य पर हमला होते हैं।
विश्वास के रिश्ते का दुरुपयोग बना सख्त सजा का कारण
मामले में सबसे गंभीर पहलू यह था कि आठ साल की पीड़िता अनाथ थी और आरोपी को “दादा” कहकर बुलाती थी। अदालत ने कहा कि यह रिश्ता प्रेम, विश्वास और सुरक्षा का होता है, लेकिन आरोपी ने इसी विश्वास का फायदा उठाकर बच्ची का यौन शोषण किया।
अदालत ने आरोपी और पीड़िता के बीच 64 वर्ष के उम्र के अंतर को भी एक गंभीर परिस्थिति माना। अदालत ने कहा कि इस उम्र के अंतर ने बच्चे को पूरी तरह असहाय और आरोपी के नियंत्रण में बना दिया।
कोर्ट ने कहा कि इस घटना ने न केवल बच्ची की शारीरिक गरिमा को चोट पहुंचाई बल्कि समाज में बड़ों के प्रति सम्मान और विश्वास को भी कलंकित किया है।
परिवार और समाज के विश्वास पर हमला: कोर्ट
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह की घटनाएं परिवार और समुदाय के बीच विश्वास की नींव को कमजोर करती हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि बड़े-बुजुर्ग बच्चों की रक्षा करते हैं, लेकिन जब वही व्यक्ति अपराध करता है तो यह पूरे सामाजिक ढांचे को झटका देता है।
अदालत ने कहा कि यह अपराध केवल पीड़िता के खिलाफ नहीं बल्कि समाज की उस व्यवस्था के खिलाफ भी है, जहां बच्चों की सुरक्षा परिवार और समुदाय पर आधारित होती है।
POCSO और BNS के तहत दोषी करार
अदालत ने आरोपी को POCSO Act Section 6 के तहत दोषी ठहराया, जो गंभीर प्रकृति के यौन हमले से संबंधित है। इसके अलावा आरोपी को Bharatiya Nyaya Sanhita के प्रावधानों के तहत भी दोषी पाया गया।
बचाव पक्ष की सभी दलीलों को अदालत ने खारिज कर दिया और मामले की गंभीरता, विश्वासघात और पीड़िता की स्थिति को देखते हुए 20 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने आरोपी पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।
मुआवजा और रिस्टोरेटिव जस्टिस पर कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने पीड़िता को पीड़ित मुआवजा योजना के तहत 13.5 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया। अदालत ने कहा कि कोई भी आर्थिक मुआवजा बच्चे के खोए हुए बचपन या मानसिक आघात की भरपाई नहीं कर सकता, लेकिन मुआवजा “रिस्टोरेटिव जस्टिस” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का हवाला
अदालत ने अपने फैसले में Supreme Court of India के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि बलात्कार केवल एक व्यक्ति के खिलाफ अपराध नहीं बल्कि पूरे समाज के खिलाफ अपराध है, खासकर तब जब पीड़ित बच्चा हो।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे अपराध संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने और शोषण से मुक्त रहने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं।
निष्कर्ष
दिल्ली की POCSO कोर्ट का यह फैसला बताता है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में अदालतें सख्त रुख अपना रही हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सजा अपराध की गंभीरता के अनुसार होनी चाहिए और ऐसे मामलों में न्याय केवल सजा देना नहीं बल्कि समाज को संदेश देना भी है कि बच्चों के खिलाफ अपराध बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।
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