27 साल बाद फैसला: आजमगढ़ शिया-सुन्नी हिंसा में 12 दोषियों को उम्रकैद

1999 के शिया-सुन्नी हिंसा से जुड़े अली अकबर हत्याकांड में 12 लोगों को उम्रकैद और ₹66,500 जुर्माने की सजा

आजमगढ़ की स्थानीय अदालत ने 1999 के शिया-सुन्नी हिंसा से जुड़े अली अकबर हत्याकांड में 12 लोगों को उम्रकैद और ₹66,500 जुर्माने की सजा सुनाई। दोषी पहले जमानत पर थे, अब दोबारा जेल भेजे गए।


उत्तर प्रदेश के Azamgarh की एक स्थानीय अदालत ने 27 वर्ष पुराने बहुचर्चित हत्याकांड में 12 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने प्रत्येक दोषी पर ₹66,500 का जुर्माना भी लगाया है।

अतिरिक्त जिला सरकारी वकील दीपक मिश्रा के अनुसार, सभी 12 दोषियों की उम्र 55 वर्ष से अधिक है और वे सुन्नी समुदाय से संबंधित हैं। फैसला सुनाए जाने के बाद, जिन्हें पहले जमानत मिली हुई थी, उन्हें पुनः हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया।

28 अप्रैल 1999: जुलूस के बाद लापता, दो दिन में मिला शव

अभियोजन पक्ष के मुताबिक, घटना 28 अप्रैल 1999 की है। Mubarakpur थाने में 57 वर्षीय अली अकबर (शिया समुदाय) के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। बताया गया कि वे एक जुलूस में शामिल होने गए थे और घर वापस नहीं लौटे।

दो दिन बाद पुलिस को एक तालाब से उनका सिर कटा हुआ शव बरामद हुआ, जिसकी पहचान परिवार ने की। जांच में सामने आया कि 27 अप्रैल को शिया और सुन्नी समुदाय के बीच झड़प हुई थी। आरोप है कि उसी पृष्ठभूमि में अली अकबर को जुलूस से लौटते समय पकड़कर हत्या की गई और शव को तालाब में फेंक दिया गया।

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हत्या के बाद क्षेत्र में तनाव फैल गया और आगे भी हिंसक घटनाएं हुईं।

16 गिरफ्तार, चार की मुकदमे के दौरान मौत

पुलिस ने इस मामले में कुल 16 लोगों को गिरफ्तार किया था। मुकदमे के दौरान चार आरोपियों की मृत्यु हो गई। शेष 12 आरोपियों को अब अदालत ने दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है।

बचाव पक्ष के वकील स्वामी नाथ यादव ने कहा है कि वे इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करेंगे। उन्होंने दावा किया कि तीन आरोपियों को छोड़कर बाकी सभी अलग-अलग परिवारों से हैं और लंबे समय से जमानत पर बाहर थे। उन्होंने यह भी कहा कि अब तक मृतक का सिर बरामद नहीं हुआ है।

कानूनी और सामाजिक निहितार्थ

करीब तीन दशक बाद आया यह फैसला सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की लंबी अवधि और साक्ष्य-आधारित सुनवाई की जटिलताओं को दर्शाता है। अब निगाहें उच्च न्यायालय में संभावित अपील और सजा के विरुद्ध आगे की कानूनी रणनीति पर टिकी हैं।


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