हाई कोर्ट परिसर में महिला वकील पर हमले के मामले में अधिवक्ता दोषी

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महिला वकील पर हमले में अधिवक्ता महेश तिवारी दोषी

रांची सिविल कोर्ट ने 2012 में झारखंड हाई कोर्ट परिसर में महिला वकील पर हमले के मामले में अधिवक्ता महेश तिवारी को दोषी ठहराया। कोर्ट ने कहा—पीड़िता की गवाही विश्वसनीय, आरोप संदेह से परे साबित।


महिला वकील पर हमले के 2012 के मामले में दोषसिद्धि

Ranchi Civil Court ने 2012 में Jharkhand High Court परिसर में महिला अधिवक्ता पर हमले के मामले में अधिवक्ता महेश तिवारी को दोषी ठहराया है। अदालत ने कहा कि पीड़िता की गवाही भरोसा पैदा करती है और अभियोजन पक्ष आरोपों को “उचित संदेह से परे” साबित करने में सफल रहा है।

अदालत ने तिवारी को महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने, स्वेच्छा से चोट पहुंचाने, गलत तरीके से रोकने और आपराधिक धमकी देने से संबंधित धाराओं के तहत दोषी पाया है। अब अदालत सजा के मुद्दे पर सुनवाई करेगी।


बार काउंसिल चुनाव और पेशेवर प्रतिद्वंद्विता बना विवाद का कारण

यह घटना 1 मई 2012 की है, जब बार काउंसिल चुनाव और पेशेवर प्रतिद्वंद्विता को लेकर तनाव का माहौल था। शिकायतकर्ता अधिवक्ता रितु कुमार और आरोपी महेश तिवारी दोनों उस दिन झारखंड हाई कोर्ट परिसर में मौजूद थे।

शिकायत के अनुसार, महिला अधिवक्ता अपने नियमित पेशेवर काम से कोर्ट आई थीं। जैसे ही वह कोर्ट नंबर 5 से बाहर निकलीं, आरोपी ने उन्हें धमकी भरे लहजे में कहा, “अब तुम्हारा क्या होगा?”

बताया गया कि तिवारी हाल ही में बार काउंसिल का चुनाव जीते थे और दोनों के बीच पहले से पेशेवर तनाव था।


थप्पड़, धक्का और गाली देने का आरोप

शिकायत के अनुसार, कहासुनी जल्द ही हिंसक झगड़े में बदल गई। आरोप है कि महेश तिवारी ने महिला वकील को थप्पड़ मारा, जमीन पर धक्का दिया और लात मारी।

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इसके साथ ही उन्होंने गंदी और अपशब्दों से भरी भाषा का इस्तेमाल किया, जिससे महिला की गरिमा को ठेस पहुंची।

अभियोजन पक्ष ने इसे सार्वजनिक स्थान पर महिला अधिवक्ता के साथ हिंसा और अपमान का गंभीर मामला बताया।


पीड़िता की गवाही पर कोर्ट का पूरा भरोसा

अदालत ने अपने फैसले में महिला अधिवक्ता की गवाही को बेहद महत्वपूर्ण माना और उन्हें “मुख्य गवाह” बताया। कोर्ट ने कहा कि उनकी गवाही पूरे मामले में लगातार एक जैसी रही और उसमें कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं था।

अदालत ने रेस गेस्टे (Res Gestae) के सिद्धांत का भी हवाला दिया। यह सिद्धांत उन बयानों या घटनाओं को स्वीकार करने की अनुमति देता है, जो घटना के तुरंत बाद या उससे सीधे जुड़े होते हैं।

कोर्ट ने उस गवाह का भी उल्लेख किया जो घटना के तुरंत बाद मौके पर पहुंचा था और पीड़िता से घटना की जानकारी प्राप्त की थी। इससे अभियोजन पक्ष के मामले को विश्वसनीयता मिली।


बचाव पक्ष की दलीलें खारिज

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मामला झूठा है और पेशेवर प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित है। बचाव पक्ष ने गवाहियों में कथित विसंगतियों और एक प्रति-मामले (counter case) का भी हवाला दिया।

हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि मामूली विसंगतियां किसी विश्वसनीय मामले को कमजोर नहीं करतीं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि बचाव पक्ष का आचरण विश्वास पैदा नहीं करता और उसके गवाह अविश्वसनीय पाए गए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों के बीच पहले से तनाव होने का मतलब यह नहीं है कि प्रत्यक्ष और सुसंगत सबूतों को नजरअंदाज कर दिया जाए।


अवमानना विवाद में भी सुर्खियों में रहे थे तिवारी

महेश तिवारी पिछले साल भी सुर्खियों में आए थे, जब झारखंड हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश के साथ सुनवाई के दौरान उनकी तीखी बहस का वीडियो वायरल हुआ था।

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वीडियो में उन्हें यह कहते हुए सुना गया था—“मैं अपने तरीके से बहस करूंगा… किसी को अपमानित करने की कोशिश मत करो… हद पार मत करो।”

उन्होंने “न्यायपालिका के कारण देश जल रहा है” जैसी टिप्पणी भी की थी, जिसके बाद उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू हुई थी।

बाद में उन्होंने Supreme Court of India का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी, लेकिन उन्हें झारखंड हाई कोर्ट के समक्ष बिना शर्त माफी मांगने की अनुमति दी। हाई कोर्ट ने उनकी माफी स्वीकार कर अवमानना कार्यवाही समाप्त कर दी थी।


अब सजा पर होगी सुनवाई

महेश तिवारी को दोषी ठहराए जाने के बाद अब अदालत सजा के मुद्दे पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनेगी। यह मामला बार और न्यायालय परिसर में वकीलों के आचरण और पेशेवर मर्यादा के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


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