नेटफ्लिक्स की आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के टाइटल को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। ब्राह्मण समुदाय की भावनाएं आहत होने का दावा करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में फिल्म की रिलीज पर रोक की मांग की गई है।
नेटफ्लिक्स द्वारा 2026 तक रिलीज होने वाली फिल्मों और सीरीज के ऐलान के बीच उसकी एक आगामी ओरिजिनल फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ को लेकर विवाद शुरू हो गया है। फिल्म के टाइटल को ब्राह्मण समुदाय की गरिमा के खिलाफ बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया गया है।
रिलीज पर रोक की मांग
वकील विनीत जिंदल ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर नेटफ्लिक्स की इस फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि फिल्म का शीर्षक ब्राह्मण समाज को सामूहिक रूप से बदनाम करने वाला और उनकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध है।
मनोज बाजपेयी निभा रहे हैं करप्ट पुलिस अफसर की भूमिका
नेटफ्लिक्स द्वारा जारी किए गए लगभग 50 सेकेंड के अनाउंसमेंट टीजर में अभिनेता मनोज बाजपेयी एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी अजय दीक्षित की भूमिका में नजर आते हैं, जिन्हें ‘पंडित’ के नाम से भी जाना जाता है। फिल्म का निर्देशन रितेश शाह ने किया है, जबकि इसे नीरज पांडे ने प्रस्तुत किया है।
टीजर में दिखाया गया है कि अजय दीक्षित दिल्ली पुलिस में सीनियर इंस्पेक्टर है, जिसका चरित्र भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरण और सत्ता के दुरुपयोग से जुड़ा हुआ बताया गया है। इसी किरदार और फिल्म के शीर्षक को लेकर विरोध तेज हो गया है।
अयोध्या–प्रयागराज में संत समाज का विरोध
फिल्म के टीजर सामने आने के बाद अयोध्या और प्रयागराज में साधु-संतों ने फिल्म के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। संत समाज ने फिल्म को ब्राह्मण विरोधी बताते हुए इसके बहिष्कार की अपील की है और नेटफ्लिक्स से फिल्म रिलीज न करने की मांग की है।
‘सोच-समझकर भूमिका चुननी चाहिए थी’: संतों की प्रतिक्रिया
अयोध्या के हनुमानगढ़ी के संत डॉ. देवेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि फिल्म का नाम ब्राह्मण समाज को बदनाम करता है। उन्होंने यह भी कहा कि अभिनेता मनोज बाजपेयी स्वयं ब्राह्मण हैं, ऐसे में उन्हें इस तरह की भूमिका स्वीकार करने से पहले विचार करना चाहिए था।
संतों का आरोप है कि ब्राह्मण समाज को लगातार निशाना बनाया जा रहा है और ऐसी फिल्मों के खिलाफ समाज को एकजुट होकर विरोध दर्ज कराना चाहिए।
कानूनी नजर अब दिल्ली हाईकोर्ट पर
फिल्म के टाइटल और कंटेंट को लेकर उठे विवाद के बीच अब निगाहें दिल्ली हाईकोर्ट पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि क्या फिल्म का शीर्षक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है या समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला माना जाएगा।
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