मानसिक क्रूरता के लगातार पैटर्न को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने पति को तलाक का हक दिया

मानसिक क्रूरता के लगातार पैटर्न को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने पति को तलाक का हक दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि पत्नी की गर्भावस्था और बाद में हुआ गर्भपात विवाह के दौरान पति पर की गई लगातार मानसिक क्रूरता के पैटर्न को खत्म नहीं कर सकते। दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्नी की गर्भावस्था और बाद के गर्भपात को मानसिक क्रूरता के लंबे पैटर्न को मिटाने वाला आधार मानने से इनकार किया। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलटते हुए पति को तलाक का हक दिया।


मानसिक क्रूरता के लगातार पैटर्न को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज: दिल्ली हाईकोर्ट ने पति को तलाक का हक दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि पत्नी की गर्भावस्था और बाद में हुआ गर्भपात विवाह के दौरान पति पर की गई लगातार मानसिक क्रूरता के पैटर्न को खत्म नहीं कर सकते। अदालत ने पति को तलाक देते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें तलाक से इनकार किया गया था।

डिवीजन बेंच — जस्टिस अनिल क्षेतरपाल और जस्टिस रेनू भटनागर — ने कहा कि विवाह में कुछ समय तक सामंजस्य या सुलह हो जाना, लंबे समय तक चले दुर्व्यवहार, धमकियों और परित्याग के पैटर्न को ढक नहीं सकता।


🔹 पति के आरोप विश्वसनीय, स्पष्ट और निरंतर — कोर्ट

हाईकोर्ट ने पाया कि पति की गवाही स्पष्ट और सुसंगत थी, जिसमें उन्होंने बताया कि—

  • पत्नी ने उनके और उनकी विकलांग मां के प्रति अपमानजनक भाषा का उपयोग किया,
  • बार-बार आत्महत्या की धमकियां दीं,
  • वैवाहिक संबंध निभाने से इनकार किया,
  • और अंततः बिना किसी कारण घर छोड़कर चली गईं
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कोर्ट ने कहा कि ये सभी तथ्य मिलकर मानसिक क्रूरता साबित करते हैं, जो कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक का वैध आधार है।


🔹 पत्नी के आरोप अविश्वसनीय— FIR, शिकायत या सबूत नहीं

पत्नी ने पति व उसके परिवार पर—

  • दहेज उत्पीड़न,
  • और ससुर द्वारा छेड़छाड़

के आरोप लगाए, लेकिन अदालत ने पाया कि—

  • किसी भी आरोप को लेकर उन्होंने कोई शिकायत, FIR या कोई सुरक्षा उपाय नहीं लिया,
  • सभी आपराधिक कार्रवाई पति द्वारा तलाक की याचिका दायर करने के बाद शुरू हुईं।

कोर्ट ने कहा कि इस तरह की देरी इन आरोपों को प्रतिक्रियात्मक और अविश्वसनीय बनाती है।


🔹 “गर्भावस्था का होना वैवाहिक सुख का प्रमाण नहीं”— हाईकोर्ट

फैमिली कोर्ट ने यह मान लिया था कि पत्नी की गर्भावस्था यह दर्शाती है कि दंपती के बीच संबंध सामान्य थे। हाईकोर्ट ने इसे कानूनी रूप से अस्थिर तर्क करार दिया।

कोर्ट ने कहा—

“वैवाहिक जीवन में एक क्षणिक स्थिरता लंबे समय तक चली मानसिक क्रूरता को समाप्त नहीं कर सकती।”

रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट था कि गर्भपात के बाद भी पत्नी का व्यवहार समान रूप से क्रूर रहा।


🔹 पति पर “क्लीन हैंड्स” सिद्धांत लागू नहीं— कोई गलत आचरण सिद्ध नहीं

फैमिली कोर्ट ने पति को इस आधार पर राहत नहीं दी कि वह ‘क्लीन हैंड्स’ सिद्धांत की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।

हाईकोर्ट ने पाया कि—

  • पति के खिलाफ किसी गलत आचरण का कोई सबूत नहीं था,
  • अतः यह तर्क पूरी तरह अनुचित और कानूनी रूप से गलत था।

🔹 विवाह का पुनर्स्थापन असंभव — कोर्ट

कोर्ट ने नोट किया कि—

  • दंपती जनवरी 2020 से अलग रह रहे हैं,
  • कोई संतान नहीं है,
  • गंभीर आरोपों ने संबंध को अपूरणीय रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया है।
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इस स्थिति में दांपत्य संबंध का पुनर्जीवन असंभव है।


अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने—

  • फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द किया,
  • विवाह (संपन्न: मार्च 2016) को विघटित कर दिया,
  • कहा कि अदालतें ऐसे मामलों में मुकदमेबाजी को लंबा खींचकर पक्षों को अनावश्यक कष्ट नहीं दें।

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