दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गलत या भ्रामक जानकारी देकर सरकारी नौकरी हासिल करना धोखाधड़ी है और ऐसा नियुक्ति रद्द करना पूरी तरह सही एवं कानूनन उचित है। FCI से बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज; कोर्ट ने कहा—अमान्य OBC प्रमाणपत्र पर नौकरी का कोई अधिकार नहीं।
गलत जानकारी देकर नौकरी पाना धोखा: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा—टर्मिनेशन पूरी तरह वैध और उचित
गलत जानकारी देकर नौकरी पाने पर टर्मिनेशन सही: दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि गलत जानकारी देकर नौकरी प्राप्त करना न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया के साथ गंभीर धोखाधड़ी भी है। इसके परिणामस्वरूप होने वाली सेवामुक्ति (Termination) को कानून में संरक्षण प्राप्त है और किसी भी कर्मचारी को गलत तथ्यों के आधार पर नौकरी पर बने रहने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
जस्टिस अवनीश झिंगन की एकल पीठ ने यह टिप्पणी रोहित खत्री बनाम फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) मामले में की, जिसमें याचिकाकर्ता ने FCI द्वारा की गई अपनी सेवामुक्ति को चुनौती दी थी।
🔹 मामले की पृष्ठभूमि: छह साल नौकरी, बाद में OBC प्रमाणपत्र अमान्य
रोहित खत्री लगभग छह वर्ष तक FCI में कार्यरत रहा। नियुक्ति OBC कैटेगरी के रिजर्व्ड पोस्ट पर हुई थी। बाद में संदेह होने पर हाई लेवल कमिटी द्वारा उसके OBC प्रमाणपत्र की जांच की गई।
जांच में पता चला कि—
- रोहित जिस समुदाय का सदस्य होने का दावा कर रहा था,
- वह समुदाय केंद्र सरकार की OBC लिस्ट में शामिल ही नहीं था।
इस आधार पर उसका OBC प्रमाणपत्र रद्द कर दिया गया और FCI ने उसे सेवा से हटा दिया।
🔹 याचिकाकर्ता की दलील: विज्ञापन में केंद्र की OBC लिस्ट की शर्त नहीं थी
रोहित खत्री की ओर से दायर याचिका में तीन आदेशों को रद्द करने की मांग की गई—
- नौकरी से निकाले जाने का आदेश,
- अपील खारिज किए जाने का आदेश,
- समीक्षा याचिका अस्वीकार किए जाने का आदेश।
उसके वकील ने दलील दी कि—
“भर्ती विज्ञापन में कहीं भी यह शर्त दर्ज नहीं थी कि उम्मीदवार की जाति केंद्र सरकार की OBC सूची में ही हो। इसलिए नियुक्ति रद्द करना गलत है।”
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने राज्य सरकार द्वारा जारी OBC प्रमाणपत्र जमा किया था, जो उसके अनुसार पर्याप्त था।
🔹 FCI का जवाब: उम्मीदवार ने गलत घोषणा दी
फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) ने कोर्ट में कहा कि—
- याचिकाकर्ता ने आवेदन करते समय स्वयं घोषणा (Declaration) दी थी कि वह केंद्र सरकार की OBC कैटेगरी से संबंधित है।
- जबकि वास्तविकता में उसने केवल राज्य सूची के आधार पर प्रमाणपत्र जमा किया।
FCI ने हाई लेवल कमिटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि—
“याचिकाकर्ता OBC आरक्षण का लाभ लेने के योग्य नहीं था, इसलिए नौकरी पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।”
🔹 हाई कोर्ट का फैसला: गलत तथ्यों पर नौकरी का कोई अधिकार नहीं
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि—
1️⃣ यदि प्रमाणपत्र ही अमान्य है, तो नियुक्ति स्वतः अमान्य हो जाती है।
2️⃣ गलत जानकारी देकर आरक्षण श्रेणी में चयनित होने वाले व्यक्ति को कोई कानूनी संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
3️⃣ यह ‘फ्रॉड’ के बराबर है, और फ्रॉड पर आधारित कोई भी दावा कानून में स्वीकार्य नहीं।
कोर्ट ने कहा:
“जब याचिकाकर्ता का OBC प्रमाणपत्र असत्य पाया गया और वह आरक्षित कोटा का लाभ लेने का पात्र नहीं था, तो नौकरी से हटाना पूरी तरह वैध है। उसके पास आरक्षित श्रेणी में बने रहने का कोई अधिकार नहीं।”
कोर्ट ने यह भी माना कि उम्मीदवार छह वर्ष नौकरी पर रहा, लेकिन इसे राहत का आधार नहीं बनाया जा सकता क्योंकि भूल या देरी धोखाधड़ी को वैध नहीं बनाती।
🔹 फैसले का महत्व: भर्ती प्रक्रिया में सत्यापन की मजबूती
हाई कोर्ट का यह निर्णय सरकारी व अर्ध-सरकारी संगठनों में भर्ती के दौरान—
- प्रमाणपत्र सत्यापन,
- आरक्षण की पात्रता,
- गलत घोषणा की कानूनी गंभीरता
—इन सभी पहलुओं पर महत्वपूर्ण संदेश देता है।
इस निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि किसी भी प्रकार की गलत घोषणा या भ्रामक दस्तावेज नौकरी छिनने का वैध आधार हैं, चाहे कर्मचारी वर्षों से सेवा में क्यों न हो।
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