Advocate General पर आरोपों वाला DSP का हलफनामा ‘पूरी तरह अनुचित’: ओडिशा हाईकोर्ट

ओडिशा हाईकोर्ट ने Advocate General के खिलाफ गंभीर आरोप लगाने वाले DSP के आपत्ति हलफनामे को अनुचित ठहराते हुए रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने मीडिया को हलफनामे की सामग्री प्रकाशित करने से भी रोका।

ओडिशा हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता और गरिमा पर जोर देते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश में डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) द्वारा दायर उस आपत्ति हलफनामे को “पूरी तरह अनावश्यक और अनुचित” करार दिया, जिसमें राज्य के एडवोकेट जनरल जैसे संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए थे।

जस्टिस बिरजा प्रसन्न सतपथी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि जब कोई मामला न्यायालय में विचाराधीन (sub judice) हो, तब ऐसे आरोप न केवल न्यायिक मर्यादा के विपरीत होते हैं, बल्कि इससे न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास भी कमजोर होता है।


मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक लंबित रिट याचिका से जुड़ा है, जिसमें अंतिम सुनवाई पूरी होने के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया गया था। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से एक अंतरिम आवेदन दायर किया गया, जिसमें 21 जनवरी 2026 को एक संबंधित रिट याचिका में दाखिल आपत्ति हलफनामे को वापस लेने और उसके लिए बिना शर्त माफी (unconditional apology) स्वीकार करने का अनुरोध किया गया।

राज्य की ओर से यह दलील दी गई कि सुनवाई के दौरान, मुद्दों की जटिलता को देखते हुए हाईकोर्ट ने एडवोकेट जनरल से केवल न्यायालय की सहायता के लिए उपस्थित होने का अनुरोध किया था। इसके बावजूद, जबकि एडवोकेट जनरल ने न तो मामले के गुण-दोष पर कोई दलील दी और न ही किसी पक्ष का समर्थन किया, उनके खिलाफ गंभीर और व्यक्तिगत आरोप हलफनामे में लगाए गए।

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हलफनामा सार्वजनिक किए जाने पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

राज्य ने यह भी बताया कि जब मामला अभी न्यायालय में लंबित था, उस समय उक्त आपत्ति हलफनामा सार्वजनिक कर दिया गया, जिससे एडवोकेट जनरल को अनावश्यक मानसिक और पेशेवर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, यहां तक कि मीडिया की ओर से उनसे सवाल भी किए गए।

कोर्ट को यह भी अवगत कराया गया कि यह हलफनामा सुनवाई के दौरान कभी कोर्ट के संज्ञान में नहीं लाया गया और इसे दाखिल करने की कोई वास्तविक आवश्यकता भी नहीं थी।

सीनियर अधिवक्ताओं के हस्तक्षेप के बाद मामले को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास किया गया, जिसके परिणामस्वरूप एक मेमो दाखिल कर आपत्ति हलफनामा वापस लेने और उसके लिए बिना शर्त माफी मांगने का अनुरोध किया गया।


हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आपत्ति हलफनामा ऐसे समय पर दाखिल किया गया, जब एडवोकेट जनरल ने न तो मामले में बहस की थी और न ही किसी प्रकार का पक्ष रखा था। ऐसे में उनके खिलाफ आपत्तियां उठाने का कोई औचित्य नहीं था।

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि संबंधित सीनियर काउंसल को अपने मुवक्किल को उचित मार्गदर्शन देना चाहिए था, बजाय इसके कि “इस तरह की कीचड़ उछालने वाली कार्यवाही” को बढ़ावा दिया जाए।

न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लंबित मामले में ऐसे हलफनामे को सार्वजनिक करना न केवल अनुचित था, बल्कि इससे एक संवैधानिक पदाधिकारी को अनावश्यक रूप से परेशान किया गया।


मीडिया पर भी रोक, रिकॉर्ड से हटाने का आदेश

जनता के विश्वास और न्याय की पवित्रता पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि “न्याय की शुद्धता ही उसकी पहचान है” और न्याय व्यवस्था जनता के भरोसे पर ही टिकी होती है। ऐसे में अदालतें यह अनुमति नहीं दे सकतीं कि निराधार आरोपों के जरिए संवैधानिक पदाधिकारियों की छवि को नुकसान पहुंचाया जाए।

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कोर्ट ने बिना शर्त माफी को स्वीकार करते हुए—

  • आपत्ति हलफनामे को वापस लेने की अनुमति दी
  • इसे न्यायालय के रिकॉर्ड का हिस्सा न मानने का निर्देश दिया
  • रजिस्ट्री की वेबसाइट से हटाने का आदेश दिया
  • प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को हलफनामे की सामग्री प्रकाशित करने से रोका

साथ ही, भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए एक कड़ा चेतावनी संदेश (word of caution) भी जारी किया गया।


फैसला

इन सभी टिप्पणियों और निर्देशों के साथ अंतरिम आवेदन का निपटारा कर दिया गया।

मामले का नाम: Sasmita Sahoo v. State of Orissa
मामला संख्या: W.P.(C) No. 34769 of 2022
निर्णय की तारीख: 03 फरवरी 2026


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