सुप्रीम कोर्ट: ‘न्यायिक सक्रियता बनी रहे, लेकिन यह न्यायिक आतंकवाद या रोमांचकता में न बदले’ — CJI BR गवई
Supreme Court: ‘Judicial activism should continue, but it should not turn into judicial terrorism or thrill-seeking’ — CJI BR Gavai
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) बनी रहनी चाहिए, लेकिन यह न्यायिक आतंकवाद या रोमांचकता में न बदले। राष्ट्रपति मुर्मू द्वारा गवर्नर और राष्ट्रपति की बिलों पर समयसीमा को लेकर राय मांगने पर सुनवाई के दौरान CJI गवई ने यह अहम टिप्पणी की।
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा दाखिल विशेष संदर्भ (Special Reference) की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने कहा कि “न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) बनी रहनी चाहिए, लेकिन यह न्यायिक आतंकवाद (Judicial Terrorism) या न्यायिक रोमांचकता (Judicial Adventurism) में नहीं बदलनी चाहिए।”
यह टिप्पणी राष्ट्रपति द्वारा बिलों पर गवर्नर और राष्ट्रपति की मंजूरी/आरक्षण से जुड़ी समयसीमा के मुद्दे पर राय माँगने के संदर्भ में हुई सुनवाई के दौरान आई।
CJI गवई और SG मेहता के बीच बहस
- CJI गवई: “अगर गवर्नर वर्षों तक बिल रोककर रखते हैं, तो क्या अदालत शक्तिहीन रहेगी? क्या तब भी न्यायिक समीक्षा का दायरा नहीं रहेगा?”
- SG तुषार मेहता: “ऐसे मामले राजनीतिक प्रक्रिया से हल किए जाने चाहिए। संविधान के तहत ‘संवैधानिक सौहार्द्र’ (constitutional comity) का मतलब है कि हर अंग को दूसरे के अधिकार का सम्मान करना चाहिए। न्यायपालिका को कुछ मामलों में संयम दिखाना होगा।”
- CJI गवई: “हम प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते, लेकिन अगर संवैधानिक प्राधिकारी ही कार्रवाई न करे, तब क्या अदालत हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे?”
सॉलिसिटर जनरल की दलीलें
- न्यायपालिका को संयम बरतने की नसीहत देते हुए SG ने अरावली गोल्फ क्लब बनाम चंदर हास (2008) का हवाला दिया:
“जजों को अपनी सीमा जाननी चाहिए। उन्हें सम्राटों जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। सत्ता का पृथक्करण (Separation of Powers) संविधान का मूल ढाँचा है और हर अंग को दूसरे का सम्मान करना होगा।” - उन्होंने कहा कि गवर्नर का पद सेवानिवृत्त राजनेताओं का आश्रय नहीं है, बल्कि इसकी अपनी संवैधानिक गरिमा है।
- केंद्र ने दलील दी कि अनुच्छेद 200 और 201 में समयसीमा का उल्लेख न होना एक “सोच-समझकर किया गया संवैधानिक विकल्प” है। कोर्ट अगर समयसीमा तय करेगा तो इससे व्याख्यात्मक भ्रम और कार्यात्मक कठिनाई पैदा होगी।
पृष्ठभूमि
- 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गवर्नर पुनर्विचार के बाद लौटे बिल को राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते और ऐसे बिल पर तुरंत हस्ताक्षर करना अनिवार्य है।
- इसी फैसले की पृष्ठभूमि में राष्ट्रपति मुर्मू ने अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट की राय मांगी।
- राष्ट्रपति ने सवाल उठाए कि क्या गवर्नर और राष्ट्रपति के बिल पर निर्णय न्यायिक समीक्षा योग्य हैं? क्या न्यायालय किसी बिल पर कानून बनने से पहले उसकी समीक्षा कर सकता है?
सुनवाई का विवरण
- केस टाइटल: In Re: Assent, Withholding or Reservation of Bills by the Governor and the President of India
- केस नंबर: Special Reference Case No. 1 of 2025
- सुनवाई की तिथि: 21 अगस्त 2025
- पीठ: CJI बी.आर. गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर
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